Monday, 20 July 2026

अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस- 20 जुलाई, 2026

चाँद तुझसे सोच कितना, प्यार हम करते रहे हैं।
रूप तेरा देख कर नित,    आह हम भरते रहे हैं।

तम सघन घिरता जमीं पर, जब नजर आता नहीं तू
साँझ होते ही नयन भर, राह हम तकते रहे हैं।

खूबसूरत हाय कितना, रूप का पर्याय लगता।
हमकदम तुझको बनाकर, ख्वाब मृदु बुनते रहे हैं।

जब सराहें रूपसी को, याद करते सिर्फ तुझको।
रूप का रूपक बुनें तो, बस तुझे चुनते रहे हैं।

है निपुण सोलह कला में, श्याम सा नित मोहता मन।
नाम रख तेरा कलाधर, हर कला गुनते रहे हैं।

नित निडर आगे निकलता, चीरकर तम तोम काला।
सीख तुझसे ये निडरता नित्य हम बढ़ते रहे हैं।

दीप होकर उस गगन का, हर रहा जग का अँधेरा।
है धरा पर कौन ऐसा, भाव मन पलते रहे हैं।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Saturday, 11 July 2026

भाषिक विकार...

लिखते सँग ये संग को, हँस को लिखते हंस।
मठाधीश ही कर रहे, भाषा का विध्वंस।।

फर्क हंस-हँस में न क्यों, समझ रहे हुशियार।
अनुनासिक लगता जहाँ, लगा रहे अनुस्वार।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Thursday, 2 July 2026

नाम सिया रक्खा था जिसका...

नाम सिया रक्खा था जिसका, कर्म स्याह कर डाले।
कितनी खुशियाँ निगलीं पल में, घर तबाह कर डाले।
रिश्ते गलत बना दूजे से,              मंगेतर को मारा।
किए आड़ में सिया नाम की,   करतब कितने काले।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

फोटो गूगल से साभार

Tuesday, 30 June 2026

आन मिला आषाढ़...

ताप भयंकर झेलकर, जले धरा के अंग।
झुलस-झुलस खुशरंग भी, हुए आज बदरंग।।

जेठ कहे आषाढ़ से,     सब्र न मुझमें वीर।
शीतल फाहे रख तुम्हीं, हरो जगत की पीर।।

आग उगलता ही रहा, झुलसा भू का चाम।
मिले इजाजत अब मुझे, कर लूँ कुछ आराम।।

सम्बन्धों की ताजगी, भावों की ले बाढ़।
खौफ खतम कर जेठ का, आया लो आषाढ़।।

© सीमा अग्रवाल


चल अब अपने गाँव...

कर ली पूरी नौकरी, चल अब अपने गाँव।
बतियाएंगे बैठकर, वट-पीपल की छाँव।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Tuesday, 23 June 2026

लखनऊ अग्नि कांड की भयावह त्रासदी पर...

बुन रहे थे स्वप्न कल के, दोष क्या था बालकों का।
देखकर संतान बढ़ती, खुश हृदय था पालकों का।
खो नियंत्रण भूख पर क्यों, काल आ लपका इन्हीं पर,
भेद सकता उर न कोई, सृष्टि के इन चालकों का।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Wednesday, 17 June 2026

बेबी बूमर्स...

'ओके बूमर' कह हमें,    खारिज़ करते लोग।
पिछड़ा हमको मानकर, बात न करते लोग।।

ईयरबड रख कान में, फिरते ये ज़ूमर्स।
दर्द किसे अपना कहें, हम बेबी बूमर्स।।

साथ हमारे लग गया,      बेबी बूमर टैग।
अपमानों का हर घड़ी, पीते भर-भर पैग।।

बूमर पीढ़ी ले रही,    शनैः शनेः अवकाश।
छोड़ जेन जी के लिए,विस्तृत भू-आकाश।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

फोटोज गूगल से साभार

Monday, 15 June 2026

विकट घाम में पौसले....

विकट घाम में पौसले,     देते जीवन दान।
बड़े पुण्य का काम है, प्यासे को जलदान।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Thursday, 28 May 2026

आज फिर...

आज फिर इन बारिशों में,
भीगने का मन बनाया।
प्रीत जागी फिर हृदय में, 
फिर तुम्हारा ध्यान आया।

सृष्टि के अवयव सभी अब,
कर रहे संकेत सुख के।
साफ है मौसम हृदय का,
छँट रहे हैं मेघ दुख के।
मौन अधरों पर हमारे,
कौन मृदु मुस्कान लाया।

आज फिर....

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)

Tuesday, 26 May 2026

मेरा औरा और...

मुझसे मेरी सी कहें, पर पीछे कुछ और।
बने रहें सबके भले,  यही आज का दौर।।

मेरे सिर आशीष है, उनके सिर पर मौर।
मेरा औरा और है,    उनका औरा और।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)

Monday, 25 May 2026

डूब जाए सूर्य भी जब...

डूब जाए सूर्य भी जब, घुप सघन अँधियार कर।
रो पड़े जब आसमां भी,  बेहिसी विस्तार पर।
खिलखिला उठती यकायक, देख जिसको यामिनी।
तालियाँ बजती रहें उस, चाँद के किरदार पर।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र)

Saturday, 23 May 2026

कुंडलिया...

बाँधे बच्चा पीठ पर,    करती दिनभर काम।
श्रम-सीकर पीकर रहे,     सहे जेठ की घाम।
सहे जेठ की घाम,     न कोई समझे मन को।
कैसे उतरे दूध,        लगे क्या खाया तन को।
हुई दोहरी पीठ,             झुके जाते हैं  काँधे।
दूभर सुख की आस, सबर भी कब तक बाँधे।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

फोटो गूगल से साभार

Thursday, 7 May 2026

युद्ध और शान्ति....

मानवता को लीलते,  दंगा-युद्ध-फसाद।
हाथ मिले तो क्या मिले, बरबादी के बाद।।

युद्ध शांति  का हल नहीं, करो स्वस्थ संवाद।
मिल आपस में बात हो, मेटे सकल विवाद।।

अंत नहीं संघर्ष का,  घोषित युद्ध विराम।
बदले की रणनीतियाँ, कल क्या दें पैगाम।।

युद्ध-फसाद-तनातनी, वैश्विक मेधा-ह्रास।
बने आपसी रार से,    धरा राहु का ग्रास।।

देख दृश्य वीभत्स ये,       सुन चौतरफा शोर।
लिखी भाग्य में दिख रही, वैश्विक विपदा घोर।।

युद्ध मानसिक खौफ है, युद्ध नरक का द्वार।
जितनी इसमें जीत है,     उससे ज्यादा हार।।

सुख-साधन के बीच भी, साले एक अभाव।
अवशेषों में देखिए,      घातक युद्ध प्रभाव।।

बात न बनती युद्ध से, होता बस संहार।
त्राहित्राहि जनता करे, हर सूं हाहाकार।।

दुनिया एक कुटुंब है, रहें सभी मिल साथ।
स्वार्थ पूर्ण इस जंग से, क्या आएगा हाथ ?।।

स्वार्थ अहम् में चूर जन, रचते नित्य बबाल।
अहं युद्ध की घोषणा, क्षमा शांति की ढाल।।

युद्ध न केवल जानिए,   तलवारों का खेल।
करे शांति का अपहरण, बोए बिष की बेल।।

जीवन सुंदरतम बने, वरो शांति की राह।
बढ़ते युद्ध-प्रमाद से, लालच-नफरत-डाह।।

डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )
"किंजल्किनी-2" से

Monday, 13 April 2026

जल में रहना है अगर...

अपशब्दों की और पर,    तान रहे बंदूक।
सुनकर क्या कोई भला, रह पाएगा मूक।।

पूँछ न बिल्ली मार दे,       बाँधे घंटी कौन।
कोई कुछ कहता नहीं, खड़े साध सब मौन।।

जल में रहना है अगर, बनो मकर का ग्रास।
चरना वरना एक दिन,    रूखी-सूखी घास।।

फूँक-फूँक रक्खो कदम, काम करो ना नीच।
श्वेतवसन में आपके,       लग ना जाए कीच।।

सदुपयोग बल का करो,   रोको भ्रष्टाचार।
काम करोगे नेक तो, होगी जय जय कार।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )

Saturday, 28 March 2026

रघुवर घर आए...

मुक्तक  ( छंद मरहटा )


१-
रघुवर घर आए, मन हरषाए, कष्ट हुए सब दूर।
जन-जन में निष्ठा, प्राण-प्रतिष्ठा, जोश अथक भरपूर।।
मंगल धुनि बाजे, अवध विराजे, अग-जग के कर्तार।
शुभ पावन आगम, भक्त समागम, खुशियाँ अपरंपार।।

२-
अग-जग के प्यारे, राजदुलारे, रामलला सुकुमार।
मोहनि अति मूरत, साँवली सूरत, कब से रही निहार।
स्वीकारो वंदन, दशरथ नंदन, दुखिया रही पुकार।
प्रभु दया विचारो, प्राण उबारो, फँसी नाव मझधार।

३-
घर-घर दीवाली, भोर निराली, लायी सुखद बहार।
जन-गण लालायित, मन आप्यायित, प्रभु का रूप निहार।
वन-वन प्रभु भटके, खल-दल पटके, छिड़ा महासंग्राम।
लिए संग सीता, परम पुनीता, लौटे प्रभु निज धाम।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

फोटो गूगल से साभार

Thursday, 26 March 2026

चैत्र मास की तिथि नवम्...

चैत्र मास की तिथि नवम्, लिया राम अवतार।
कौशल्या की कोख से,    उपजा जग-कर्त्तार।।

काँधे पर कोदंड है,   अभिमंत्रित हर वाण।
शोषक का संहार कर, दें शोषित को त्राण।।

राम एक गतिशीलता, राम एक हैं पंथ।
राम चरित यों जानिए, जैसे पावन ग्रंथ।।

लीला अद्भुत आपकी, अद्भुत है लालित्य।
वर्णित जिसमें आप हैं, अद्भुत वह साहित्य।।

रोम-रोम में रम रहे,       रमण करें श्रीराम।
मन मानस मेरा बने, सुखद अयोध्या धाम।।

खिले सरोरुह से नयन, कोमल कुसुमित प्रान।
चरण-कमल से आपके,  मन   पावन-उद्यान।।

डोर तुम्हारे हाथ प्रभु, आर करो या पार।
जगत हमारा पालना, तुम हो पालनहार।।

किए बिना वन में गमन, राम न होते राम।
संघर्षों में जीत है,        हारें नित आराम।।

त्याग समर्पण साधना, कर्मनिरत निष्काम।
वनवासी होकर हुए,    मन-मन वासी राम।।

रहता जल में ज्यों कमल, रहे जगत में राम।
माया से निर्लिप्त थे,     मायापति सुखधाम।।

राजकुँवर रघुवंश के,    वश में जिनके पौन।
विरक्त समाधि लीन वह, योगी उनसा कौन ?

करो समर्पण राम सा,  सीता सा संघर्ष।
जो तुम चाहो देखना, प्रेम - नेम उत्कर्ष।।

अद्भुत संयम शील है,    नहीं आप सा अन्य।
चरण-आचरण आपके, करें जगत को धन्य।।

राम सरिस हो आचरण, राम सरिस हो त्याग।
मिटें तामसी वृत्तियाँ,      जागें जग के भाग।।

राम नाम का ध्यान ही,   करता बेड़ा पार।
बंधन जिसके हम बँधे, वही मुक्ति आधार।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )


Friday, 20 March 2026

रहे सुरक्षित वानिकी...

छाया दी जिस वृक्ष ने,    पोसा देकर अन्न।
आज उसी को काटता, मानव बड़ा कृतघ्न।।

चिड़िया बैठी सोच में, तिनका-तिनका जोड़।
रचूँ नीड़  किस  वृक्ष पर, कब मानव दे तोड़।।

छीन रहे हम स्वार्थ-वश, वन्य-जीव आवास।
पशु-पक्षी बेघर हुए,           झेल रहे संत्रास।।

वन पृथ्वी के फेंफड़े, वन पृथ्वी की श्वास।
वन से जीवन-जोत है, वन जीवन की आस।।

वन दुनिया के फेफड़े, तलछट देते छान।
शुद्ध करें जलवायु को, वन हैं देव समान।।

पीकर कार्बन का जहर,   देते अमृत दान।
तरुवर जीवन के लिए, कुदरत का वरदान।।

नीड़-माँद उजड़े सभी, बिखरे तिनका-पात।
खग-मृग मन-मन कोसते, क्या मानव की जात।।

वृक्षों का रोपण करो, पोषण दो भरपूर।
आएगी वरना प्रलय, दिवस नहीं वह दूर।।

आओ हम सब आज ही, खाएँ ये सौगंध।
जीवन भर निभाएंगे , प्रकृति-पुत्र संबंध।।

पादप सत के रोपिए,  पनपे अंतस - बोध।
अहं भाव को रोकिए, बस इतना अनुरोध।।

मिले फसल मनभावनी,        बिरबे ऐसे रोप।
फल आशा-अनुरूप हो, झलके आनन ओप।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)

फोटो गूगल से साभार

Thursday, 19 March 2026

तप निरत ब्रह्मचारिणी...

कठोर व्रती तपस्विनी, ब्रह्मचारिणी मात।
भक्ति-मगन शिवलीन हो, भूलीं सुधबुध गात।।

लिए कमंडल वाम में, दाँए में जप-माल।
तप निरत ब्रह्मचारिणी, दमके तेजस भाल।।

शिव-आराधन लीन हो,     त्यागे सारे भोग।
बिल्व पत्र के बल किए, सिद्ध साधना योग।।

निराहार निर्जल शिवा, शिवमय सुबहो-शाम।
त्याग पर्ण तन धारतीं,      पड़ा अपर्णा नाम।।

लिए शंभु की चाह में, जन्म एक सौ आठ।
जपें शिवा शिव नाम बस, भूलीं सारे ठाठ।।

चाह घनी मन में बसी, पाना है निज प्रेय।
भूलीं सारे भोग माँ,  याद रहा बस ध्येय।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )

Wednesday, 18 March 2026

कष्ट हरो माँ शैलजे...

शिव-आराधन लीन हो,     त्यागे सारे भोग।
बिल्व पत्र के बल किए, सिद्ध साधना योग।।

निराहार निर्जल शिवा, शिवमय सुबहो-शाम।
त्याग पर्ण तन धारतीं,      पड़ा अपर्णा नाम।।

लिए शंभु की चाह में, जन्म एक सौ आठ।
जपें शिवा शिव नाम बस, भूलीं सारे ठाठ।।

चाह घनी मन में बसी, पाना है निज प्रेय।
भूलीं सारे भोग माँ,  याद रहा बस ध्येय।।

सुख-दुख में समभाव हो, रहे बीच बन सेतु।
साधन शक्ति सुमंगला,  बने विजय का हेतु।।

वाम हस्त सोहे कमल, दाएँ हस्त त्रिशूल।
शैलसुता बृषवाहिनी, हरतीं जग के शूल।।

अर्द्ध चंद्र मस्तक फबे, कर सोहे त्रिशूल।
ताप हरो  माँ शैलजे, हर  लो सारे  शूल।।


अद्भुत माँ की शक्तियाँ...

नवग्रह एकाकार हो, करते जब मन क्लांत।
माता की नव शक्तियाँ,  करतीं उनको शांत।।१।।

अद्भुत माँ की शक्तियाँ, अद्भुत माँ का रूप।
दर्शन देतीं भक्त को,        धारे रूप अनूप।।२।।

नवरातों में पूज लो,       मैया के नवरूप।
मोहक छवि मन में बसा, हो जाओ तद्रूप।।३।।

कलुष वृत्ति मन की हरें, माता के नव रूप।
भक्ति-शक्ति के जानिए,   मूर्तिमंत स्वरूप।।४।।

पूजो माता के चरन,   ध्या लो उन्नत भाल।
वरद हस्त माँ का उठे, हर ले दुख तत्काल।।५।।

रिपुओं से रक्षा करे,    बने भक्त की ढाल।
बरसे जब माँ की कृपा, कर दे मालामाल।।६।।

मधुर-भाव चुन चाव से, सजा रही दरबार।
मेरे घर भी अंबिके,  आना  अबकी  बार।।७।।

माता के दरबार में, कोई ऊँच न नीच।
समरसता बरसे यहाँ, भर-भर नेह उलीच।।८।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )