Saturday, 23 May 2026

कुंडलिया...

बाँधे बच्चा पीठ पर,    करती दिनभर काम।
श्रम-सीकर पीकर रहे,     सहे जेठ की घाम।
सहे जेठ की घाम,     न कोई समझे मन को।
कैसे उतरे दूध,        लगे क्या खाया तन को।
हुई दोहरी पीठ,             झुके जाते हैं  काँधे।
दूभर सुख की आस, सबर भी कब तक बाँधे।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

फोटो गूगल से साभार

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