बाँधे बच्चा पीठ पर, करती दिनभर काम।
श्रम-सीकर पीकर रहे, सहे जेठ की घाम।
सहे जेठ की घाम, न कोई समझे मन को।
कैसे उतरे दूध, लगे क्या खाया तन को।
हुई दोहरी पीठ, झुके जाते हैं काँधे।
दूभर सुख की आस, सबर भी कैसे बाँधे।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )
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