चाँद तुझसे सोच कितना, प्यार हम करते रहे हैं।
रूप तेरा देख कर नित, आह हम भरते रहे हैं।
तम सघन घिरता जमीं पर, जब नजर आता नहीं तू
साँझ होते ही नयन भर, राह हम तकते रहे हैं।
खूबसूरत हाय कितना, रूप का पर्याय लगता।
हमकदम तुझको बनाकर, ख्वाब मृदु बुनते रहे हैं।
जब सराहें रूपसी को, याद करते सिर्फ तुझको।
रूप का रूपक बुनें तो, बस तुझे चुनते रहे हैं।
है निपुण सोलह कला में, श्याम सा नित मोहता मन।
नाम रख तेरा कलाधर, हर कला गुनते रहे हैं।
नित निडर आगे निकलता, चीरकर तम तोम काला।
सीख तुझसे ये निडरता नित्य हम बढ़ते रहे हैं।
दीप होकर उस गगन का, हर रहा जग का अँधेरा।
है धरा पर कौन ऐसा, भाव मन पलते रहे हैं।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )