Wednesday, 17 June 2026

बेबी बूमर्स...

'ओके बूमर' कह हमें,    खारिज़ करते लोग।
पिछड़ा हमको मानकर, बात न करते लोग।।

ईयरबड रख कान में, फिरते ये ज़ूमर्स।
दर्द किसे अपना कहें, हम बेबी बूमर्स।।

साथ हमारे लग गया,      बेबी बूमर टैग।
अपमानों का हर घड़ी, पीते भर-भर पैग।।

बूमर पीढ़ी ले रही,    शनैः शनेः अवकाश।
छोड़ जेन जी के लिए,विस्तृत भू-आकाश।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

फोटोज गूगल से साभार

Monday, 15 June 2026

विकट घाम में पौसले....

विकट घाम में पौसले,     देते जीवन दान।
बड़े पुण्य का काम है, प्यासे को जलदान।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Thursday, 28 May 2026

आज फिर...

आज फिर इन बारिशों में,
भीगने का मन बनाया।
प्रीत जागी फिर हृदय में, 
फिर तुम्हारा ध्यान आया।

सृष्टि के अवयव सभी अब,
कर रहे संकेत सुख के।
साफ है मौसम हृदय का,
छँट रहे हैं मेघ दुख के।
मौन अधरों पर हमारे,
कौन मृदु मुस्कान लाया।

आज फिर....

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)

Tuesday, 26 May 2026

मेरा औरा और...

मुझसे मेरी सी कहें, पर पीछे कुछ और।
बने रहें सबके भले,  यही आज का दौर।।

मेरे सिर आशीष है, उनके सिर पर मौर।
मेरा औरा और है,    उनका औरा और।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)

Monday, 25 May 2026

डूब जाए सूर्य भी जब...

डूब जाए सूर्य भी जब, घुप सघन अँधियार कर।
रो पड़े जब आसमां भी,  बेहिसी विस्तार पर।
खिलखिला उठती यकायक, देख जिसको यामिनी।
तालियाँ बजती रहें उस, चाँद के किरदार पर।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र)

Saturday, 23 May 2026

कुंडलिया...

बाँधे बच्चा पीठ पर,    करती दिनभर काम।
श्रम-सीकर पीकर रहे,     सहे जेठ की घाम।
सहे जेठ की घाम,     न कोई समझे मन को।
कैसे उतरे दूध,        लगे क्या खाया तन को।
हुई दोहरी पीठ,             झुके जाते हैं  काँधे।
दूभर सुख की आस, सबर भी कब तक बाँधे।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

फोटो गूगल से साभार

Thursday, 7 May 2026

युद्ध और शान्ति....

मानवता को लीलते,  दंगा-युद्ध-फसाद।
हाथ मिले तो क्या मिले, बरबादी के बाद।।

युद्ध शांति  का हल नहीं, करो स्वस्थ संवाद।
मिल आपस में बात हो, मेटे सकल विवाद।।

अंत नहीं संघर्ष का,  घोषित युद्ध विराम।
बदले की रणनीतियाँ, कल क्या दें पैगाम।।

युद्ध-फसाद-तनातनी, वैश्विक मेधा-ह्रास।
बने आपसी रार से,    धरा राहु का ग्रास।।

देख दृश्य वीभत्स ये,       सुन चौतरफा शोर।
लिखी भाग्य में दिख रही, वैश्विक विपदा घोर।।

युद्ध मानसिक खौफ है, युद्ध नरक का द्वार।
जितनी इसमें जीत है,     उससे ज्यादा हार।।

सुख-साधन के बीच भी, साले एक अभाव।
अवशेषों में देखिए,      घातक युद्ध प्रभाव।।

बात न बनती युद्ध से, होता बस संहार।
त्राहित्राहि जनता करे, हर सूं हाहाकार।।

दुनिया एक कुटुंब है, रहें सभी मिल साथ।
स्वार्थ पूर्ण इस जंग से, क्या आएगा हाथ ?।।

स्वार्थ अहम् में चूर जन, रचते नित्य बबाल।
अहं युद्ध की घोषणा, क्षमा शांति की ढाल।।

युद्ध न केवल जानिए,   तलवारों का खेल।
करे शांति का अपहरण, बोए बिष की बेल।।

जीवन सुंदरतम बने, वरो शांति की राह।
बढ़ते युद्ध-प्रमाद से, लालच-नफरत-डाह।।

डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )
"किंजल्किनी-2" से