Saturday, 14 February 2026

उन शहीदों को नमन...

पुलवामा में शहीद हुए हमारे वीर सैनिकों की स्मृति में ...

देश-हित जो    मर मिटे उन शहीदों को नमन।
छल से जिनके सर कटे उन शहीदों को नमन।

खाते रहे आतंकी की जो गोलियों पे गोलियाँ।
 सीना ताने रहे डटे   उन शहीदों को नमन।

रह सकें महफूज हम सब घर में अपने चैन से।
कर्तव्य-पथ से जो न हटे उन शहीदों को नमन।

जयहिंद-जयहिंद नींद में भी बड़बड़ाते जो सदा।
बदलते रहे नित करवटें  उन शहीदों को नमन।

शहादत उनकी याद कर नमनाक हैं अब भी नयन।
चले गए  तिरंगे में लिपटे उन शहीदों को नमन।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )
14 फरवरी

Friday, 13 February 2026

वैलेंटाइन वीक....

वैलेंटाइन वीक...

हम भी चले मनाने अबके
वैलेंटाइन वीक।
डूब रहे थे प्रेम-भँवर में
तोड़ पुरानी लीक।

पहला दिन था चुन बगिया से
लाए एक गुलाब।
घुटनों के बल बैठ प्रिय को
देकर कहा जनाब-
तुम भी करो प्रपोज हमें अब
देकर प्रेम-प्रतीक।

एक हाथ में हाथ हमारा
एक हाथ में रोज़।
बड़े प्रेम से निरख नयन में
प्रिय ने किया प्रपोज।
लव यू लव यू कहकर बीता
दूजा दिवस सटीक।

दिवस तीसरा प्रेम पगा था
लाया नया खुमार।
रंग-बिरंगी चॉकलेट का
मिला हमें उपहार।
रखा कौर इक ज्यों ही मुँह में
आई हमको छींक।

टैडी लेकर आए प्रियतम
चौथे दिन की रात।
रखकर उसे हाथ में बोले
स्वीकारो सौगात।
कहो बात कुछ अपने मन की
बैठो निकट घरीक।

प्रॉमिस डे पर बोले प्रियवर
प्रण लेता हूँ आज।
साथ निभाऊँ सदा तुम्हारा
पूर्ण करूँ हर काज।
प्रण पर अपने अडिग रहूँगा
समझो नहीं अलीक।

हग डे पर हम और पिया जी
हो आलिंगन  बद्ध।
साथ-साथ जीने-मरने को
थे दिल से प्रतिबद्ध।
डाल कमर में बाँह प्रिय ने
खींच लिया नजदीक।

आया किस डे खड़े निकट प्रिय
सटा चीक से चीक।
नत आनन हम लाज भरे, पर
डटे रहे निर्भीक।
अधर अधर रख बोले प्रियतम
करो प्रेम तस्दीक।

उत्सव का माहौल बना था
दृश्य सुखद रमणीक।
देने आशीर्वाद हमें जब
अपने हुए शरीक।
सराबोर कर गयी हृदय को
अद्भुत ये तकनीक।

सात दिवस ये सात जनम से
देते ये संदेश।
बनी रहे मृदुता रिश्तों में
मधुमय हो परिवेश।
गोते खाकर प्रेमोदधि में
भूले गम-तारीक।

खुशी-खुशी यूँ मना हमारा,
वैलेंटाइन वीक।

© डॉ. सीमा अग्रवाल
 मुरादाबाद ( उ.प्र. )
"गीत सौंधे जिंदगी के" से

Tuesday, 20 January 2026

बात है ये उन दिनों की...

बात है ये उन दिनों की...

उन दिनों की बात में रस।
उन दिनों की रात में रस।
उन दिनों मौसम हसीं था,
उन दिनों बरसात में रस।

उन दिनों बातें निराली।
उन दिनों रातें उजाली।
उन दिनों सब कुछ सुखद था,
उन दिनों हर ओर लाली।

उन दिनों हर दिन रँगीला।
उन दिनों सावन सजीला।
साँझ पलकों पर उतरती,
आँजती अंजन लजीला।

उन दिनों हँसना सरल था।
भावभीना   मन तरल था।
बोल अमृत से सने थे,
उन दिनों कब ये गरल था।

उन दिनों को याद करते,
आँख से आँसू बरसते।
उन दिनों की बात क्या,अब
बात करने को तरसते।

अब भरे हों माल कितने,
पर कहाँ दिल में जगह है।
बेवजह बस हँस रहे हैं,
अब कहाँ सुख की वजह है।

अब सभी सुख साज घर में
पर कहाँ सुख उन दिनों सा।
हर   तरफ   वीरानगी   है,
घुप  तमस  है  दुर्दिनों  सा।

आज भी ठहरे वहीं हम,
उन दिनों को जी रहे हैं।
रिस रहा हर पोर से जो,
अर्क  नेहिल  पी  रहे हैं।

हूक सी मन में उठी है,
उन दिनों को छीन लाएँ।
टूटकर छिटकी कहीं जो,
हर कड़ी वो बीन लाएँ।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Thursday, 15 January 2026

सर्द महीना माघ...

पौष मास को कर विदा, आया देखो माघ।
बैठा जम कर जिन्न सा, लगता कैसा  घाघ।।

बर्फ पहाड़ों पर गिरी,         ठिठुर रहे मैदान।
पाला खुशियों पर पड़ा, सिकुड़ रहे अरमान।।

कुहरा छाया दूर तक,   दिखा रहा है ताव।
माघी शीतल चाँदनी, करती उर पर घाव।।

सर्दी देखो माघ की, जमी पड़ीं सब झील।
कुहरे ने तांडव रचा,  खुशियाँ सारी लील।।

माघ मास पाला पड़ा, बढ़ता अनुदिन शैत्य।
धरा अनवरत खोजती, छुपे कहाँ आदित्य ?।।

सोकर बीतें शीत में,  सुबह-दुपहरी-शाम।
हाथ-पाँव चलते नहीं, कैसे सिमटें काम।।

लुढ़का पारा शून्य पर, कुहर-शीत की धूम।
सूरज भी आया मनो,  सर्द हिमालय चूम।।

पाला पड़ा दिमाग पर, हाथ-पाँव सब सुन्न।
बिस्तर में दुबके हुए,       सभी पड़े हैं टुन्न।।

माघ मास की शीत है,     चलीं हवाएँ सर्द।
ठिठुर-ठिठुर कर हो रहा, चंद्रानन भी जर्द।।

शीत यामिनी माघ की,  गिरा रही थी गाज।
हिमखंडों को चीरता, निकला सूरज आज।।

बरस रही है व्योम से, नाजुक नरम निदाघ।
कुछ दिन के आतिथ्य पर, सर्द महीना माघ।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Sunday, 11 January 2026

सर्द महीना माघ...

पौष मास को कर विदा, आया देखो माघ।
बैठा जम कर जिन्न सा, लगता कैसा  घाघ।।

कुहरा छाया दूर तक,  दिखा रहा है ताव।
माघी शीतल चाँदनी, करती उर पर घाव।।

सर्दी देखो माघ की, जमी पड़ीं सब झील।
कुहरे ने तांडव रचा,  खुशियाँ सारी लील।।

माघ मास पाला पड़ा, बढ़ता अनुदिन शैत्य।
धरा अनवरत खोजती, छुपे कहाँ आदित्य ?।।

सोकर बीतें शीत में,  सुबह-दुपहरी-शाम।
हाथ-पाँव चलते नहीं, कैसे सिमटें काम।।

लुढ़का पारा शून्य पर, कुहर-शीत की धूम।
सूरज भी आया मनो,  सर्द हिमालय चूम।।

पाला पड़ा दिमाग पर, हाथ-पाँव सब सुन्न।
बिस्तर में दुबके हुए,       सभी पड़े हैं टुन्न।।

माघ मास की शीत है,    चलीं हवाएँ सर्द।
ठिठुर-ठिठुर कर हो रहा, चंद्रानन भी जर्द।।

शीत यामिनी माघ की,  गिरा रही थी गाज।
हिमखंडों को चीरता, निकला सूरज आज।।

बरस रही है व्योम से, नाजुक नरम निदाघ।
कुछ दिन के आतिथ्य पर, सर्द महीना माघ।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)

Sunday, 23 November 2025

सफ़र जिंदगी का...

सफर जिंदगी का सरल अब कहाँ है !
सुकूं वो दिलों में रहा अब कहाँ है !

बदल सा रहा है चलन भी घरों का,
इमारत बड़ी घर बड़ा अब कहाँ है !

फलित अब न होतीं दुआएँ-बलाएँ,
कथन में रहा वो असर अब कहाँ है !

गहन है उदासी वदन पर तुम्हारे,
चपलता भरी वो नजर अब कहाँ है !

सभी का जहां ये वतन भी सभी का,
मगर एकता की झलक अब कहाँ है !

रहन भी सहन भी बदल सब गया है,
बड़ों की घरों में कदर अब कहाँ है !

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Saturday, 1 November 2025

चल पड़े अंतिम सफर पर...

चल पड़े अंतिम सफर पर,
अब न तुम पर भार होंगे।
अलविदा कह इस जगत को,
जल्द ही उस पार होंगे।

चिरविदा दो अब हमें तुम।
वक्त अंतिम आ रहा है।
बुझ रहे सब दीप, दृग में
तम घना सा छा रहा है।
बोल दो दो बोल मन के,
साथ ये  उपहार होंगे।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)