Tuesday, 26 May 2026

मेरा औरा और...

मुझसे मेरी सी कहें, पर पीछे कुछ और।
बने रहें सबके भले,  यही आज का दौर।।

मेरे सिर आशीष है, उनके सिर पर मौर।
मेरा औरा और है,    उनका औरा और।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)

Monday, 25 May 2026

डूब जाए सूर्य भी जब...

डूब जाए सूर्य भी जब, घुप सघन अँधियार कर।
रो पड़े जब आसमां भी  बेहिसी विस्तार पर।
खिलखिला उठती यकायक देख जिसको यामिनी।
तालियाँ बजती रहें उस चाँद के किरदार पर।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र)

Saturday, 23 May 2026

कुंडलिया...

बाँधे बच्चा पीठ पर,  करती दिनभर काम।
श्रम-सीकर पीकर रहे,   सहे जेठ की घाम।
सहे जेठ की घाम,   न कोई समझे मन को।
कैसे उतरे दूध,      लगे क्या खाया तन को।
हुई दोहरी पीठ,           झुके जाते हैं  काँधे।
दूभर सुख की आस,    सबर भी कैसे बाँधे।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

फोटो गूगल से साभार

Thursday, 7 May 2026

युद्ध और शान्ति....

मानवता को लीलते,  दंगा-युद्ध-फसाद।
हाथ मिले तो क्या मिले, बरबादी के बाद।।

युद्ध शांति  का हल नहीं, करो स्वस्थ संवाद।
मिल आपस में बात हो, मेटे सकल विवाद।।

अंत नहीं संघर्ष का,  घोषित युद्ध विराम।
बदले की रणनीतियाँ, कल क्या दें पैगाम।।

युद्ध-फसाद-तनातनी, वैश्विक मेधा-ह्रास।
बने आपसी रार से,    धरा राहु का ग्रास।।

देख दृश्य वीभत्स ये,       सुन चौतरफा शोर।
लिखी भाग्य में दिख रही, वैश्विक विपदा घोर।।

युद्ध मानसिक खौफ है, युद्ध नरक का द्वार।
जितनी इसमें जीत है,     उससे ज्यादा हार।।

सुख-साधन के बीच भी, साले एक अभाव।
अवशेषों में देखिए,      घातक युद्ध प्रभाव।।

बात न बनती युद्ध से, होता बस संहार।
त्राहित्राहि जनता करे, हर सूं हाहाकार।।

दुनिया एक कुटुंब है, रहें सभी मिल साथ।
स्वार्थ पूर्ण इस जंग से, क्या आएगा हाथ ?।।

स्वार्थ अहम् में चूर जन, रचते नित्य बबाल।
अहं युद्ध की घोषणा, क्षमा शांति की ढाल।।

युद्ध न केवल जानिए,   तलवारों का खेल।
करे शांति का अपहरण, बोए बिष की बेल।।

जीवन सुंदरतम बने, वरो शांति की राह।
बढ़ते युद्ध-प्रमाद से, लालच-नफरत-डाह।।

डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )
"किंजल्किनी-2" से

Monday, 13 April 2026

जल में रहना है अगर...

अपशब्दों की और पर,    तान रहे बंदूक।
सुनकर क्या कोई भला, रह पाएगा मूक।।

पूँछ न बिल्ली मार दे,       बाँधे घंटी कौन।
कोई कुछ कहता नहीं, खड़े साध सब मौन।।

जल में रहना है अगर, बनो मकर का ग्रास।
चरना वरना एक दिन,    रूखी-सूखी घास।।

फूँक-फूँक रक्खो कदम, काम करो ना नीच।
श्वेतवसन में आपके,       लग ना जाए कीच।।

सदुपयोग बल का करो,   रोको भ्रष्टाचार।
काम करोगे नेक तो, होगी जय जय कार।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )

Saturday, 28 March 2026

रघुवर घर आए...

मुक्तक  ( छंद मरहटा )


१-
रघुवर घर आए, मन हरषाए, कष्ट हुए सब दूर।
जन-जन में निष्ठा, प्राण-प्रतिष्ठा, जोश अथक भरपूर।।
मंगल धुनि बाजे, अवध विराजे, अग-जग के कर्तार।
शुभ पावन आगम, भक्त समागम, खुशियाँ अपरंपार।।

२-
अग-जग के प्यारे, राजदुलारे, रामलला सुकुमार।
मोहनि अति मूरत, साँवली सूरत, कब से रही निहार।
स्वीकारो वंदन, दशरथ नंदन, दुखिया रही पुकार।
प्रभु दया विचारो, प्राण उबारो, फँसी नाव मझधार।

३-
घर-घर दीवाली, भोर निराली, लायी सुखद बहार।
जन-गण लालायित, मन आप्यायित, प्रभु का रूप निहार।
वन-वन प्रभु भटके, खल-दल पटके, छिड़ा महासंग्राम।
लिए संग सीता, परम पुनीता, लौटे प्रभु निज धाम।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

फोटो गूगल से साभार

Thursday, 26 March 2026

चैत्र मास की तिथि नवम्...

चैत्र मास की तिथि नवम्, लिया राम अवतार।
कौशल्या की कोख से,    उपजा जग-कर्त्तार।।

काँधे पर कोदंड है,   अभिमंत्रित हर वाण।
शोषक का संहार कर, दें शोषित को त्राण।।

राम एक गतिशीलता, राम एक हैं पंथ।
राम चरित यों जानिए, जैसे पावन ग्रंथ।।

लीला अद्भुत आपकी, अद्भुत है लालित्य।
वर्णित जिसमें आप हैं, अद्भुत वह साहित्य।।

रोम-रोम में रम रहे,       रमण करें श्रीराम।
मन मानस मेरा बने, सुखद अयोध्या धाम।।

खिले सरोरुह से नयन, कोमल कुसुमित प्रान।
चरण-कमल से आपके,  मन   पावन-उद्यान।।

डोर तुम्हारे हाथ प्रभु, आर करो या पार।
जगत हमारा पालना, तुम हो पालनहार।।

किए बिना वन में गमन, राम न होते राम।
संघर्षों में जीत है,        हारें नित आराम।।

त्याग समर्पण साधना, कर्मनिरत निष्काम।
वनवासी होकर हुए,    मन-मन वासी राम।।

रहता जल में ज्यों कमल, रहे जगत में राम।
माया से निर्लिप्त थे,     मायापति सुखधाम।।

राजकुँवर रघुवंश के,    वश में जिनके पौन।
विरक्त समाधि लीन वह, योगी उनसा कौन ?

करो समर्पण राम सा,  सीता सा संघर्ष।
जो तुम चाहो देखना, प्रेम - नेम उत्कर्ष।।

अद्भुत संयम शील है,    नहीं आप सा अन्य।
चरण-आचरण आपके, करें जगत को धन्य।।

राम सरिस हो आचरण, राम सरिस हो त्याग।
मिटें तामसी वृत्तियाँ,      जागें जग के भाग।।

राम नाम का ध्यान ही,   करता बेड़ा पार।
बंधन जिसके हम बँधे, वही मुक्ति आधार।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )