Thursday, 19 March 2026

तप निरत ब्रह्मचारिणी...

कठोर व्रती तपस्विनी, ब्रह्मचारिणी मात।
भक्ति-मगन शिवलीन हो, भूलीं सुधबुध गात।।

लिए कमंडल वाम में, दाएँ में जप-माल।
तप निरत ब्रह्मचारिणी, दमके तेजस भाल।।

शिव-आराधन लीन हो,     त्यागे सारे भोग।
बिल्व पत्र के बल किए, सिद्ध साधना योग।।

निराहार निर्जल शिवा, शिवमय सुबहो-शाम।
त्याग पर्ण तन धारतीं,      पड़ा अपर्णा नाम।।

लिए शंभु की चाह में, जन्म एक सौ आठ।
जपें शिवा शिव नाम बस, भूलीं सारे ठाठ।।

चाह घनी मन में बसी, पाना है निज प्रेय।
भूलीं सारे भोग माँ,  याद रहा बस ध्येय।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )

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