Tuesday, 30 June 2026

आन मिला आषाढ़...

ताप भयंकर झेलकर, जले धरा के अंग।
झुलस-झुलस खुशरंग भी, हुए आज बदरंग।।

जेठ कहे आषाढ़ से,     सब्र न मुझमें वीर।
शीतल फाहे रख तुम्हीं, हरो जगत की पीर।।

आग उगलता ही रहा, झुलसा भू का चाम।
मिले इजाजत अब मुझे, कर लूँ कुछ आराम।।

सम्बन्धों की ताजगी, भावों की ले बाढ़।
खौफ खतम कर जेठ का, आया लो आषाढ़।।

© सीमा अग्रवाल


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