Thursday, 5 September 2024

रास्ता तुमने दिखाया...

जब थका तन हारता मन,
हौसला तब-तब बढ़ाया।
लक्ष्य पर नित बढ़ रही मैं,
रास्ता तुमने दिखाया।

बेबसी के उस प्रहर में,
ढा रहा था जग कहर जब।
सुर सधी आवाज भी ये,
हो रही थी बेअसर जब।
हर तरफ वीरानगी थी,
घिर रही थी दुख-भँवर में,
तब बढ़ाकर हाथ अपना,
पार तुमने ही लगाया।

एक कोने में पड़ी थी,
थे सभी सुख-साज दुर्लभ।
पंख फैला कल्पना के,
छू रही हूँ आज मैं नभ।
जब जहाँ भी मैं रही हूँ,
तुम सदा मन में रहे हो।
मैं भ्रमित थी राह में जब,
बढ़ सुपथ तुमने सुझाया।

क्या गलत है क्या सही है,
कुछ नहीं मुझको पता था।
कौन था बस एक तू, जो-
हाल मेरा जानता था।
जो मिला तुमसे मिला है,
सच कहूँ ये आज खुलकर,
सब तुम्हारी ही बदौलत,
आज कुछ जो कर दिखाया।

लक्ष्य पर नित बढ़ रही मैं,
रास्ता तुमने दिखाया।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)'गत आगत अनागत' से


Tuesday, 3 September 2024

पशु-पक्षी बेघर हुए...( वन्य जीव संरक्षण दिवस पर )

छाया दी जिस वृक्ष ने,    पोसा देकर अन्न।
आज उसी को काटता, मानव बड़ा कृतघ्न।।

चिड़िया बैठी सोच में, तिनका-तिनका जोड़।
रचूँ नीड़  किस  वृक्ष पर, कब मानव दे तोड़।।

बंदर बेघर हो रहे,  छिने ठिकाने-ठौर।
जाएँ तो जाएँ कहाँ, कौन करे ये गौर।।

छीन रहे हम स्वार्थ-वश, वन्य-जीव आवास।
पशु-पक्षी बेघर हुए,           झेल रहे संत्रास।।

नीड़-माँद उजड़े सभी, बिखरे तिनका-पात।
खग-मृग मन-मन कोसते, क्या मानव की जात।।

पादप सत के रोपिए,  पनपे अंतस - बोध।
अहं भाव को रोकिए, बस इतना अनुरोध।।

मिले फसल मनभावनी,        बिरबे ऐसे रोप।
फल आशा-अनुरूप हो, झलके आनन ओप।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)
'किंजल्किनी' से
फोटो गूगल से साभार

Sunday, 1 September 2024

मानते हो राम को तो...

मानते हो राम को तो....

मानते हो राम को तो,
मानना होगा तुम्हें ये।
हर अहं से दूर थे वे,
जानना होगा तुम्हें ये।

राम का मंदिर बनाकर,
किस कदर मगरूर थे तुम।
स्वार्थ के ही थे निकटतर,
राम से तो दूर थे तुम।
राम रमते रोम में हैं,
जानना होगा तुम्हें ये।

राम अब सेवक हमारे,
जो कहेंगे वो करेंगे।
चूर मद में सोचते तुम,
अब विजय हम ही वरेंगे।
सोच थी कितनी अपावन,
मानना होगा तुम्हें ये।

दिग्भ्रमित रावण हुआ था,
शिव सहित कैलाश लाकर।
अब बनूँगा मैं त्रिलोकी,
शंभु को मस्का लगाकर।
दंभ ले डूबा वही बस,
जानना होगा तुम्हें ये।

राम का तब राज्य होगा,
गुण वरो जो राम से तुम।
दुष्ट कितना कुछ कहे पर,
मौन संयम साध लो तुम।
आचरण बोलें तुम्हारे,
ठानना होगा तुम्हें ये।

द्वेष सब मन से निकालो।
राममय निज को बना लो।
नीति के पथ पर चलो नित,
राजनीति' ये बना लो।
सार क्या संसार में है,
छानना होगा तुम्हें ये।

शक्ति उसके उर समाती,
सत्य के पथ पर चले जो।
लाभ क्या उस बाहुबल का,
निर्बलों को ही छले जो।
राम क्या थे राज्य के हित,
जानना होगा तुम्हें ये।

थी परीक्षा ये तुम्हारी,
भूल सब अपनी सुधारो।
प्रभु कृपा से पास हो,अब
डूबती नैया उबारो।
राम के आदर्श क्या थे,
जानना होगा तुम्हें ये।

मानते हो राम को तो,
मानना होगा तुम्हें ये।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

"दशरथ नंदन राम"से

05 जून, 2024



Saturday, 31 August 2024

१ सितंबर- राष्ट्रीय क्षमा दिवस...

गलत अगर कोई करे, करें क्षमा का दान।
राह सुझाएँ सत्य की, हो सबका कल्यान।।

बैर बैर से ना मिटे, और सघन हो जाय।
क्षमा-भाव मन से वरो, प्रेम-जलद छलकाय।।

सहनशीलता अरु क्षमा, सीख धरा से यार।
कैसे अपनी पीठ पर, ढोती जग का भार।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)
फोटो गूगल से साभार

जीवन तपमय बाज का...

करना है कुछ खास तो, बनो बाज से आप।
दृढ़शक्ति एकाग्र मना,    लेता नभ को नाप।।

नजर घनी शक्ति प्रचंड, कहते उसको बाज।
करता उच्च उड़ान भर, आसमान पर राज।।

जीवन तपमय बाज का, वरता दृढ़ संकल्प।
निर्णय ले जोखिम भरा, करता कायाकल्प।।

देख चुनौती सामने,   होता नहीं निराश।
सूझबूझ-संकल्प से, काटे दुख के पाश।।

एक समय जब अंग सब, देने  लगें जवाब।
सूझ बड़ी अपनी दिखा, ले आता नव आब।।

चोंच पटक चट्टान पर, देता खुद को चोट।
नयी निकल आने तलक, काढ़े चुन-चुन खोट।।

त्याग-लगन-एकाग्रता, मान बाज से सीख।
पाँच माह भूखा रहे,    मरे, न  माँगे भीख।।

जीवन-शैली बाज की, देती यह संदेश।
जीवन जीयो शान से, फटक न पाएँ क्लेश।।

© सीमा अग्रवाल

मुरादाबाद

फोटो गूगल से साभार


Monday, 5 August 2024

चला आया घुमड़ सावन...

एक मुक्तक...

चला आया घुमड़ सावन, नहीं आए मगर साजन।
टपकती छत सतत मेरी, छवाऊँ अब कहाँ छाजन ?
दुलारा है तुम्हारा ये, मगर मुझको सताता है।
कहो भोले मुझे ही क्यों, बनाया कोप का भाजन ?

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )




Sunday, 4 August 2024

माँगती मन्नत सदा माँ....

घूँट पीकर भी जहर का,
बाँटती अमृत हमें माँ।
बाल बाँका हो न शिशु का,
माँगती मन्नत सदा माँ।

खुद पढ़ी या ना पढ़ी हो,
है प्रथम शिक्षक हमारी।
अंग ढीले पड़ गए पर,
कर रही तीमारदारी।
सौंपती जन्नत हमें पर,
हो रही उपकृत स्वयं माँ।

माँजती  संस्कार देती।
इक नया आकार देती।
परवरिश में संतति की,
सुख निजी सब वार देती।
कर्म नित ऐसे करें हम।
हर कदम आदृत रहे माँ।

पालती हमको जतन से,
पय पिलाकर पोसती है।
डाँटती भी जो कभी तो,
बाद खुद को कोसती है।
सीख शुभ संस्कार तुझसे,
सुत-सुता संस्कृत रहें माँ।

जब तलक हैं साथ माँ के,
तब तलक हम हैं सुरक्षित।
अन्नपूर्णा  माँ   हमारी,
रह न सकते हम बुभुक्षित।
जब तलक तेरा सहारा,
हम सदा आश्वस्त हैं माँ।

पूर्ण कर अरमान तेरे,
हम तुझे हर मान  देंगे।
जान-तन में तू बसी है,
तू कहे  तो जान देंगे।
धड़कनों में घुल समायी,
प्राण में झंकृत रहे माँ।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )
साझा संग्रह "भाव अरुणोदय" में प्रकाशित