Sunday, 3 May 2020

सोच रही गौरैया...

सोच रही गौरैया.....

सींखचे पर खिड़की के आज आ बैठी एक गौरैया
देख रही थी  टुकुर-टुकुर  खामोश थे भाभी-भैया
चिंतामगन बैठे थे दोनों बीच में एक मीटर की दूरी
कोई किसी को टच करे न  हुई ऐसी क्या मजबूरी
काम पर भी नहीं जाते  क्यों  खाली बैठे घर भैया
सोच रही गौरैया...

रद्द किया  कहीं आना-जाना  रद्द  किए सब न्योते
कितनी बार उठ-उठकर दोनों हाथ रगड़कर धोते
एक कमरे में चुन्नू अकेला दिखी एक में बूढ़ी मैया
क्यों नहीं छत पर आते भैया उड़ाने अब कनकैया
सोच रही गौरैया.....

जगी जिज्ञासा मन में उसकी था कोई ओर न छोर
कातर नज़रों से देख रहीं क्यों  भाभी उसकी ओर
पिंजरे में बंदकर मुझको जो कहतीं थी सोनचिरैया
उनके लिए बन गयी पिंजर अपनी ही आज मड़ैया
सोच रही गौरैया....

सुना एक वायरस 'कोरोना' उड़ चीन देश से आया
मंडरा रहा समूची दुनिया पर काल रूप धर आया
लाचार  बेबस आज मनुज  फँसी  मझधार में नैया 
उठ जाएगा मेरा दाना-पानी  गर रहे न भाभी-भैया
सोच रही गौरैया....

- डॉ.सीमा अग्रवाल
सी-89, जिगर कॉलोनी
मुरादाबाद (उ.प्र.)

जान है तो जहान है ....


न सँभले हैं अभी हालात और कुछ दिन  घर में रहो
ख्याल रखो अपना-अपनों का न बीच शहर  में रहो

संयम से रह  किसी तरह  ये मुश्किल दिन बिता लो
रहो  सुकून  से  घर में  दो रोटी  सुकून  की  खा लो
प्राण हथेली पर  ले अपने निकलो न जबरन  बाहर
एकांतवास  करो निज घर में  आई विपद् को टालो

मंडरा रहा है काल देखो  दुनिया ही समूची  लीलने
ए परिंदों ! इल्तिज़ा ये तुमसे  तुम भी  शज़र में रहो

जीविका हित दूर हो  प्राण कलपते रहे जिनके लिए
आज नसीब से पल मिले ये जी लो इन्हें उनके लिए
*जान है तो जहान है* वरना जग ही सारा मसान है
रहें मिल सब घर में अपने हितकर यही सबके लिए

गिले-शिकवे रह न जाएँ पल ऐसे फिर आएँ न आएँ
अपने रहें नज़रों में तुम्हारी  तुम उनकी नज़र में रहो

जान के घाटे से बेहतर अर्थ-व्यापार में घाटा सह लो
जीभर सुनो व्यथा अपनों की जीभर अपनी कह लो
कठिन घड़ी है कठिन चुनौती करो सामना हिम्मत से
कुदरत की सौगात समझ नेह-पिंजर में अपने रह लो

न  जोश-ए-वहशत  में  रहो   न  ग़म-ए-दहर  में  रहो
ए गज़ल ! तुम भी कुछ दिन  बंद अपनी बहर में रहो

-सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)

*ग़म-ए-दहर-sorrow of world*
*जोशे-वहशत=उन्माद की तीव्रता*

भाखा किसकी हाय फली है....

भाखा किसकी हाय फली है
सूनी  शहर की  हर  गली  है

काँप  रही  है  दुनिया थरथर
बैठा  सर  पर  काल  बली है

दिन  बीता  अफरातफरी  में
गम  में  डूबी  साँझ  ढली  है

अच्छे दिन अब  क्या आयेंगे
मुरझ गयी उम्मीद - कली  है

दूर है मंजिल   साथ न  कोई
राह   पथरीली    दलदली  है

जीवन-संध्या   खड़ी  सामने
उमर  जवानी  बीत  चली  है

क्या-क्या और  देखना बाकी
घड़ी  कठिन  बड़ी  बेकली है

भोग रहा नर  फल करनी का
खग-मृगकुल में  बात चली है

लगता अगली राह  मनुज की
मुड़  निसर्ग की ओर  चली है

कानों में  रस  घोल  रही  आ
गुंजित   हवा  में  काकली  है

मिट रही अब  धैर्य की 'सीमा'
मच रही  दिल में  खलबली है

- डॉ.सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)

गो कोरोना गो कोरोना....

गो कोरोना, गो कोरोना....

ये करो ना वो करो ना
क्या करो और क्या करो ना
आयी कैसी मनहूस घड़ी ये
जां साँसत में आ रहा रोना
गो कोरोना, गो कोरोना....

साथ न रहना साथ न सोना
सोते लेकर अलग बिछोना
हाथ भी धोते रगड़-रगड़ कर
हो न जाए कुछ अनहोना
गो कोरोना, गो कोरोना...

बाहर न जाते मास्क लगाते
अपने ही घर में गश्त लगाते
बड़ी वीरानगी पसरी हर सूं
सूना जग का कोना-कोना
गो कोरोना, गो कोरोना...

प्रच्छन्न रूप में क्यों तुम आये
घात भी करते नज़र  चुराये
कौन जनम का बैर हो पाले
हिम्मत हो तो खुलके कहो ना
गो कोरोना, गो कोरोना...

भेजे हो किसके कुछ तो बोलो
चुप न रहो यूँ राज तो खोलो
लड़ो वीर से समर-भूमि में
छुपछुपकर यूँ वार करो ना
गो कोरोना, गो कोरोना...

लगते  कोई असुर मायावी
नजर न आए कहीं छाया भी
अमूर्त रूप में काल बन आए
करते हो क्या जादू-टोना
गो कोरोना, गो कोरोना...

जिसकी शह पे तुम यहाँ आए
लाज उसे क्या जरा न आए
वजूद उसका कितना बौना
खेल रहा जो खेल घिनौना
गो कोरोना, गो कोरोना...

जहाँ से आए जाओ वहीं अब
बेवजह यूँ न सताओ हमें अब
कुछ तो अपना मान भी रखो
ढीठ से आखिर जमे रहो ना
गो कोरोना, गो कोरोना...

लॉक डाउन हुए हम घर में
अपराधी से अपनी नजर में
बिन गलती के दण्ड मिले तो
कहो, आए न किसको रोना
गो कोरोना, गो कोरोना

निज गृह में हम बंदी तुम्हारे
कैदी- जीवन जीते हारे
बहुत हुआ अब बस भी करो ना
कैद से अपनी मुक्त करो ना
गो कोरोना, गो कोरोना...

-डॉ.सीमा अग्रवाल
सी-89, जिगर कॉलोनी
मुरादाबाद (उ.प्र.)

Wednesday, 5 February 2020

मन अनुरागी श्याम तुम्हारा...

१- मन अनुरागी श्याम तुम्हारा... मन अनुरागी श्याम तुम्हारा मेरे भटकते मन- प्राणों का, तुम ही एक सहारा साँवरे रूप में डूब तुम्हारे, निखरा रंग हमारा मन-मंदिर के वासी तुमसे, प्रतिबिंबित जग सारा तब-तब ठोकर खाई मैंने, जब-जब तुम्हें बिसारा कितने अधम जनों को तुमने, एक पुकार पर तारा लेने को मेरी प्रेम-परीक्षा, माया का मोहक जाल पसारा भव-बंधन से मुक्त करो अब, तोड़ ये निर्मम कारा । २ संग अंधेरों के मैं खेली... संग अंधेरों के मैं खेली रात है मेरी सखी सहेली प्यार से अपने अंक लगाती रहने न देती मुझे अकेली चाँद-सितारे उतर के नभ से संग मेरे करते अठखेली हँसें मंद-मंद चाँद-चाँदनी लगे मन नीकी रात जुनेली पग धर धरा पर धीरे-धीरे चलती सँभलकर नार नवेली जिंदगी जो आसान कभी थी लगती वही अब गूढ़ पहेली जिन सपनों पे लुटाया जीवन उन सपनों ने जान ही ले ली रहे न हास-हुलास-रास-रंग सूनी है अब दिल की हवेली नेह का सागर जहाँ छलकता हमने वहाँ भी जिल्लत झेली कोई किसी से बड़ा न छोटा राजा भोज या गंगू तेली खुशियाँ हाट मिलें नहीं 'सीमा' धरे रह जाते रुपया- धेली - डॉ.सीमा अग्रवाल सी-89, जिगर कॉलोनी मुरादाबाद (उ.प्र.)

इश्क आसान नहीं होता है...

इश्क आसान  नहीं होता है ------

मन-सीपी    याद सँजोता है
कभी हँसता   कभी रोता है
सुख चैन खुदी सब खोता है
इश्क   आसान नहीं होता है

उसकी यादें       उसकी बातें
उसके सपने        बुनती रातें
विकल मन  करता हाहाकार
मिलतीं अश्कों की    सौगातें
              हँस   भार गमों का  ढोता है
              इश्क   आसान नहीं होता है

जग से        बेगाना रहता है
खुद से       अंजाना रहता है
गुमसुम-गुमसुम खोया रहता
पर गम न किसी से कहता है
             अपने पग     कंटक बोता है
              इश्क  आसान नहीं होता है

राह इसकी   बड़ी पथरीली
चाहत भी है अति नखरीली
मन आँकता  छवि प्रिय की
रहती हरदम  आँख पनीली
              एक पल न चैन से सोता है
              इश्क आसान नहीं होता है

गम खाकर औ आँसू पीकर
जीवन का गुजारा करता है
डूबा रहता याद में प्रिय की
खुद को ही बिसारा करता है
              बड़ा अजब नज़ारा होता है
              इश्क आसान  नहीं होता है

नैन गगरिया   छलकी जाती
जीवन-बाती   घटती  जाती
छाती धड़कती फटती जाती
जिह्वा नाम बस रटती जाती
                दीदार न जब तक होता है
                इश्क आसान नहीं होता है

अंगार-सा  जलना होता है
बादल-सा बरसना होता है
बिंधता  कली-सा शूलों से
तब हार रिदय का होता है
             अश्कों में   लगाता गोता है
             इश्क आसान  नहीं होता है

पर इश्क न हो  गर जीवन में
जीने का मज़ा कहाँ आता है
प्रिय-छवि न हो गर  नैनन में
मन-पृष्ठ   कोरा  रह जाता है
            बहता छलछल नीर नयन से
            विकार सब मन का धोता है

इश्क आसान  नहीं होता है...

- डॉ.सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)

मेरी तीन रचनाएँ...


१- गुनो सार जीवन का...

इधर-उधर  मत  डोलो
मन  की  आँखें  खोलो

तोड़ो न दिल किसी का
असत्य  कभी  न बोलो

रखकर  कर्म-तुला  पर
सुख-दुख  दोनों  तोलो

प्रायश्चित   के  जल  से
मल  पापों  का धो  लो

लौट  अतीत  की  ओर
बिखरे  मनके   पो  लो

फैले   बेल   खुशी   की
बीज  नेह   के  बो   लो

हो  शरीक  पर-गम   में
पलभर पलक भिगो लो

करो  न  बैर  किसी  से
सबके  अपने   हो   लो

बोलो    अमृत     वाणी
गरल  न  मन  में  घोलो

गुनो  सार   जीवन   का
यादें   मधुर   सँजो   लो

मूंद  लो   थकी   पलकें
नींद  सुकूं  की  सो  लो

- डॉ.सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)

२- वक्त-वक्त की बात ....

कल वक्त हम पर अनुरक्त हुआ
पल आज वो गुजरा  वक्त हुआ

आज  वो   हमसे  दूर  बहुत  है
दिल जिसपे कभी आसक्त हुआ

वक्त-वक्त की है बात, कहें क्या
कभी नरम कभी तो सख्त हुआ

दम से जिसके  हसीं थी दुनिया
वही  अब  हमसे  विरक्त  हुआ

जब-जब भी उससे नज़र मिली
मुखड़ा  लजाया  आरक्त  हुआ

उफनता  सागर  जज़्बातों   का
शब्दों में  कहाँ अभिव्यक्त हुआ

साथ छोड़ चले  जब अपने  ही 
भारी  पलड़ा भी  अशक्त हुआ

शीशा ए दिल का  हाल न पूछो
कितने हिस्सों  में  विभक्त हुआ

सुकून  कहाँ  मन पाए  उसका
जो अपनों  से  परित्यक्त  हुआ

चल निकलीं तिकड़में जिसकी
वही सब पर हावी सशक्त हुआ

साथ जिसका दिया किस्मत ने
जमाना  उसी  का  भक्त  हुआ

हुई  विलीन असीम  में  'सीमा'
अंश  अंशी   से  संपृक्त   हुआ

- डॉ.सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)

३- हर लो हरि-हर...

हर लो हरि-हर, हर गम मेरा !
लगा लिया अब मैंने प्रभुवर,
तुम्हारे चरन-कमलों में डेरा !
हर लो हरि-हर, हर गम मेरा !

तेरी जगती में जब सब सोते,
बस एक अकेली जगती हूँ मैं !
नाम की तेरे  दे कर दुहाई,
प्राणों को अपने ठगती हूँ मैं !
      मन में मूरत बसी है तेरी,
      जिह्वा पर बस नाम है तेरा !
हर लो हरि-हर, हर गम मेरा !

मैंने सुना है भक्त पुकारे,
तब तुम दौड़े आते हो !
अपना हर एक काम जरूरी
उस पल छोड़े आते हो !
      अपने प्रन की लाज रख लो,
      डालो इधर भी फेरा !
हर लो हरि-हर, हर गम मेरा !

जाना जब से, अंश हूँ तेरा
खोज में तेरी, हुई दीवानी ।
नाता जबसे जुड़ा है तुमसे
जग से मैं सारे, हुई बेगानी ।
      अज्ञान-तिमिर हर लो मेरा,
      कर दो अब सुखद सवेरा ।
हर लो हरि-हर, हर गम मेरा !

खुद से जुदा कर मुझको तुमने
भेज दिया संसार में ।
कैसे तुम तक अब मैं आऊँ
भटक रही मझधार में ।
       कोई सुगम सी राह सुझा दो
        मुझे महा विपद् ने घेरा ।
हर लो हरि-हर, हर गम मेरा !

-डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)