Thursday, 13 April 2023

दो दोहे...

मिली पात्रता से अधिक, पचे नहीं सौगात।
कर उतनी ही कामना, हो जितनी औकात।।

सब अपने दुख में दुखी, किसे सुनाएँ हाल।
ढोना है खुद ही हमें, अपना दुख – बेताल।।

© सीमा अग्रवाल
जिगर कॉलोनी, मुरादाबाद

Wednesday, 12 April 2023

अजब गजब इन्सान....


अजब-गजब इन्सान…

अजब-गजब इंसान…

नहीं किसी की फिक्र इन्हें, बस
अपने सुख का ध्यान।
खान गुणों की समझें खुद को,
बाँटे सबको ज्ञान।

हाँ में हाँ जो कहता इनकी,
देते उसको भाव।
बोल सत्य के लगते तीखे,
करते उर पर घाव।
सुख-दुख अपने गाते सबसे,
दें न किसी पर कान।

भौतिक सुख के साधन ही बस,
आते इनको रास।
सीधे-सरल-शरीफों का ये,
करते नित उपहास।
हुआ नहीं अग-जग में पैदा,
इनसे बड़ा महान।

तनिक लाभ की आस लिए जो,
जाता इनके पास।
गाँठ कटाकर वो भी अपनी,
आता लौट उदास।
लिए दुकानें बैठे ऊँची,
पर फीके पकवान।

करते मुँह खुलने से पहले,
बोली सबकी बंद।
क्या कहना, कितना कहना है,
इनकी चले पसंद।
तुच्छ जताने में सबको ये,
समझें अपनी शान।

अपनी कही बात को ही ये,
पल में जाते भूल।
कोई सच समझाए यदि तो,
चुभते इनके शूल।
चूल हिलाते आते सबकी,
आता ज्यों तूफान।

जान लगा दो इनकी खातिर,
मानें कब अहसान।
वक्त पड़े पर काम न आते,
बन जाते नादान।
अपनी कमियाँ लादे सर पे,
चलते सीना तान।

देखे कितने बंदे जग में,
बड़े एक से एक।
पर हर इक खूबी का जैसे,
है इनमें अतिरेक।
उपमा इनकी दूँ मैं किससे,
मिले नहीं उपमान।

खान गुणों की समझें खुद को,
बाँटे सबको ज्ञान।
अजब-गजब इंसान !

© डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )
” मनके मेरे मन के” से

मिलता नहीं मुकाम....

पड़ते ही बाहर कदम, जकड़े जिसे जुकाम।
कितने ही कर ले जतन,  पाता नहीं मुकाम।।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

मुँह से निकली बात के....

पुण्यात्मा के हाथ भी, हो जाते हैं पाप ।

पुण्यात्मा के हाथ भी, हो जाते हैं पाप ।
प्रायश्चित का वारि तब, धोता उनकी छाप ।।

मुँह से निकली बात के, लग जाते हैं पैर ।
बात बतंगड़ गर बने, बढ़ जाते हैं बैर ।।

धन दौलत औ शोहरत, तेरी उत्कट चाह ।
पगले, तू तो चल पड़ा, बरबादी की राह ।।

फल तो उसके हाथ है, करना तेरे हाथ ।
निरासक्त हो कर्म कर, देगा वो भी साथ ।।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Tuesday, 11 April 2023

पाला हो या गर्म हवा हो....

वृक्षों के उपकार….

वृक्षों के उपकार…

पाला हो या गर्म हवा हो,
या अँधियारी रात।
हर मुश्किल में अडिग खड़े ये,
सहते हर आघात।
विकट परिस्थिति आएँ कितनी,
मानें कभी न हार।

गुनो जरा तो मन में अपने,
वृक्षों के उपकार।
परहित में रत देव सरीखे,
लिए खड़े उपहार।
गरल कार्बन का पीकर ये,
करें जगत-उद्धार।

सुरक्षा-कवच वृक्ष हमारे,
ऑक्सीजन के स्रोत।
इनके होने से हम सबकी,
जलती जीवन-जोत।
रक्षक बन ये वैद्य सरीखे
करते हर उपचार।

चला कुदाली क्यों इन पर तुम,
लेते इनकी जान ?
मूढ़ ! यही तो देते जग को,
प्राण वायु का दान।
स्वार्थ लिप्त हो काट इन्हें क्यों,
करते खुद पर वार।

जीव-जंतु आश्रित सब इनपर
इनसे सकल जहान।
हमें-तुम्हें सबको ही मिलकर
रखना इनका ध्यान।
स्वस्थ रहें हम दम पर इनके
मिले पुष्ट आहार।

करें कृतज्ञता ज्ञापित अपनी,
ले रक्षा का भार।
बचे रहें हम, बचे रहें वन,
बचा रहे संसार।

© सीमा अग्रवाल
जिगर कॉलोनी
मुरादाबाद
“मनके मेरे मन के” से

नियत समय संचालित होते....

नियत समय संचालित होते…

नियत समय संचालित होते,
कुदरत के व्यापार।
नहीं किसी को द्वेष किसी से,
नहीं किसी से खार।

नियत सभी की सीमाएँ हैं,
नियत सभी के कर्म।
सूरज-चाँद-सितारे-नभ-सरि,
निभा रहे नित धर्म।
अस्वीकृति का कभी किसी में ,
उपजा नहीं विचार।

कुदरत से जो मिला जिसे है,
सहज उसे स्वीकार्य।
बिना स्वार्थ जगहित रत प्रकृति,
सीखो कुछ औदार्य।
थाल सजाए स्वाद अनूठे,
लिए खड़ी साकार।

कार्य जिसे जो मिला नियति से,
उसे निभाना धर्म।
काबिलियत है किसमें कितनी,
कहते उसके कर्म।
चलना पथ पर सच्चाई के,
जीत मिले या हार।

रखते हैं सब पृथक् वृत्तियाँ,
हुनर सभी में भिन्न।
नहीं और से गुण तुझमें तो,
काहे होता खिन्न ?
कौन यहाँ संपूर्ण जगत में,
किसमें नहीं विकार ?

मूर्ख ! लोभ में क्षणिक सुखों के,
मत कर पाप जघन्य।
परहित में अर्पित कर काया,
करते ज्यों पर्जन्य।
स्वार्थ कुटिल ही बैठा भीतर,
भरता तुझमें धार।

सुंदरतम कृति तू ईश्वर की,
बुद्धि ज्ञान संपन्न।
दुर्दशा कर स्वयं ही अपनी,
काहे खड़ा विपन्न ?
लौट प्रकृति की ओर मनुज, तो
माँ-सा मिले दुलार।

© डॉ. सीमा अग्रवाल,
जिगर कॉलोनी,
मुरादाबाद ( उ.प्र.)
“अंतर्मन के भाव” से

Monday, 10 April 2023

उठो जागो बढ़े चलो बंधु....

उठो, जागो, बढ़े चलो बंधु…( स्वामी विवेकानंद की जयंती पर उनके दिए गए उत्प्रेरक मंत्र से प्रेरित होकर लिखा गया मेरा स्वरचित गीत)

उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु…

उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु,
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

सपने सतरंगी आगत के,
सजें तुम्हारी आँखों में।
जज्बा जोश लगन सब मिलकर,
भर दें उड़ान पाँखों में।

रखकर गंतव्य निगाहों में,
अर्जुन सम तीर चलाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु,
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

तुम युवक ही रीढ़ समाज की,
टिका है भविष्य तुम्हीं पर।
तुम्हीं देश के कर्णधार हो,
नजरें सभी की तुम्हीं पर।

निज ऊर्जा, महत्वाकांक्षा से
ऊँचा तुम इसे उठाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु,
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

मंजिल चूमे कदम तुम्हारे,
भरी हो खुशी से झोली।
देख तुम्हारे करतब न्यारे,
नाचें झूमें हमजोली।

देश तरक्की करे चहुँमुखी,
अग जग में मान बढ़ाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु,
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

कुदरत के लघु अवयव को भी,
क्षति न कभी तुम पहुँचाना।
पूज चरण पीपल-बरगद के,
बैठ छाँह में सुस्ताना।

दीन-हीन निरीह जीवों को,
जीवन की आस बँधाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु,
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

असामाजिक तत्व समाज के
खड़े राह को रोकें तो,
डाह भरे निज सम्बन्धी भी
छुरा पीठ में भोंकें तो,

करके नजरंदाज सभी को
पथ अपना सुगम बनाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु,
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

– ©® डॉ0 सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)
साझा काव्य संग्रह ” वेदांत ” में प्रकाशित