ध्यान-उपवास-साधना, स्व अवलोकन कार्य।

ध्यान-उपवास-साधना, स्व अवलोकन कार्य।
हितकर चातुर्मास में, धर्म-कर्म-औदार्य।।
बरसे बादल झूम के, आया सावन मास।
रोम-रोम से फूटता, धरती का उल्लास।।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

ध्यान-उपवास-साधना, स्व अवलोकन कार्य।
हितकर चातुर्मास में, धर्म-कर्म-औदार्य।।
बरसे बादल झूम के, आया सावन मास।
रोम-रोम से फूटता, धरती का उल्लास।।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

इस दुनिया की ये फितरत है।
अपना कहती फिर छलती है।
बाहर- बाहर मीठी बातें,
पर भीतर चालें चलती है।
किए बड़े थे उसने वादे।
मगर नहीं थे नेक इरादे।
झूठ खुला तो जाना, कैसे
चतुराई रूप बदलती है।
मीठी बोली में विष-गोली।
नज़र बचाकर उसने घोली।
भाँप न पाया दिल ये मेरा,
इसमें मेरी क्या गलती है ?
दिल पर जो छुपछुप घात करे।
छल से आहत जज्बात करे।
वाकिफ सदा रहे इस सच से,
आह भी एक दिन फलती है।
जग में सूरज- चाँद-सितारे।
आते – जाते बारी – बारी।
दिन भी सदा न सबका रहता,
रात भी सभी की ढलती है।
कभी किसी की रातें लम्बी।
कभी किसी के दिन बढ़ जाते।
भाग बराबर मिलता सबको,
समता से दुनिया चलती है।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद
चाँद नभ से दूर चला, तके अमावस मौन।
विरह-विदग्धा यामिनी, व्यथा सुनेगा कौन ?।।
© सीमा अग्रवाल
जिगर कॉलोनी, मुरादाबाद

नित सुरसा -सी बढ़ रही, इच्छा शक्ति दुरंत।
कहाँ रुकेगी लालसा, कहाँ स्वार्थ का अंत।।
मन में है दुविधा बड़ी, जाए तो किस ओर।
सोच न पाए मन विकल, हुई रैन से भोर।।
रख मत जोड़बटोर कर, नश्वर सब सुखसाज।
माटी में मिलते दिखे, कितने तख्तोताज।।
लिप्सा तज संतोष-धन, मन में करो निवेश।
शाश्वत सुख की संपदा, हर लेती हर क्लेश।।
© सीमा अग्रवाल