Tuesday, 16 May 2017

अवकाश पर है चाँद....


हाँ
रात हूँ मैं
काली अंधियारी
नहीं रूपसी मैं कोई
पर हो जाती हूँ रूपहली
रूप का आगार
मेरा अतुल श्रंगार
उज्ज्वल सलोना चाँद जब
आ विराजता अंक में मेरे
दमक उठता श्याम रंग
निखर उठता अंग- अंग
फूली ना समाती मैं

मुझे है भरोसा
दिन भर की अथक गति से ऊब
डूबेगा रवि जब
उदधि के गहन गह्वर में
तुम चले आओगे
शीतोदधि में नहा
पहन उजला वसन सजीला
डग भरते शनैः शनैः
आगोश में मेरे
छुप जाओगे
कर दोगे आलोकित
मेरा तमसावृत सूना जहां

दिन भर ही तो
तकती हैं निगाहें
छुप- छुप तेरे पदचिन्ह धूमिल
दूर एक कोने से
उस छोर तक क्षितिज के
आस में तेरे आगम की
टकटकी लगाए
निहारा करती तुझे मैं अपलक, अविराम
कि होते ही दिवसावसान
आन समाएगा तू अंक में मेरे
मिट जाएगी मधुर स्पर्श से तेरे
दिन भर की थकन मेरी भी

पर आज तो
बीतती गयीं घड़ियाँ इंतजार की
रीतती गयी हर आस
ना मिली जब तेरी रत्तीभर भी झलक
मेरी भी थकी- हारी मुंदने लगीं पलक
तुझे ना आना था, ना आया
निढाल, बेबस, अनमनी सी मैं
जूझती रही अंधेरों से
पूछती रही पता तेरा सितारों से
सुना तो सन्नाटे में रह गयी
पता चला अमावस है आज
ये तेरा मासिक अवकाश है !

                   --- सीमा अग्रवाल ---

Thursday, 2 March 2017

रे मन पगले, मान ले बात ---

लुटाता रहा तू सब पर प्यार
कभी तो अपनी ओर निहार

स्वार्थ ग्रसित है जग ये सारा
सिर्फ अपने मतलब का यार

जगती हँसती सुख में अपने
तू क्यों ढोए अश्कों का भार

तू ही नहीं जब अपना होगा
कौन करेगा तुझपर उपकार

गिरती दिन- दिन सेहत तेरी
पड़ेगा एक दिन लंबा बीमार

रे मन पगले, मान ले अब तू
ना कर यूँ खुद पर अत्याचार

घटता जाए तिल-तिल जीवन
किस पल का है तुझे इंतजार

जब अपने पर आकर पड़ती
रोता है मनुज तब नौ-नौ धार

अपनी खुशी में खुश रह तू भी
जी मस्ती में दिन बचे जो चार

उस असीम का अंश है तू भी
सीमा पर अपनी कर न विचार

कोई न खेवट जीवन- नैया का
सँभाल तू खुद अपनी पतवार

- सीमा
०२-०३-२०१७

Wednesday, 1 March 2017

ये कैसी खामोशियाँ -

उमड़ रहा पारावार खुशी का
फिर क्यों हैं ये खामोशियाँ
लब हों भले ही शांत, ठिठके
नजरें तोड़ रहीं खामोशियाँ
लगी है देखो आग फाग की
गुनगुनाओ कि कोई राग सजे
मुसकुरा रहे तुम जो मंद- मंद
गढ़ रहीं भाषा नई खामोशियाँ
- सीमा

Sunday, 12 February 2017

बस यूँ ही हम हँसते रहे ---


बस यूँ ही हम हँसते रहे
रेखाएँ गम की ढकते रहे

उमड़ा सैलाब दुखों का
एक खुशीे को भटकते रहे

रीत गया दिन आस लगाए
साथ को उनके तरसते रहे

आलिंगन उनका पा न सके
दूर- दूर से ही बस तकते रहे

मन की जमीं सूखी ही रही
नयनों से बदरा बरसते रहे

क्यूं अपनी ही नजरों में हम
बन कर काँटा कसकते रहे

हम बेबस हुए, लाचार हुए
बिलखते रहे, सिसकते रहे

न आया उन्हें तरस भी जरा
बेबसी पे हमारी हँसते रहे

ढाढस तो क्या बँधातेे हमें
फब्तियाँ हम पर कसते रहे

कंचन- सा मन अपना हम
कसौटी पर नित कसते रहे

भाव उनके आसमां पे चढ़े
हम मगर सस्ते के सस्ते रहे

हुए नाकाम, साहिल न मिला
बीच- भंवर हम उलझते रहे

उम्मीदों के पल, तिल- तिल
मुट्ठी से हमारी खिसकते रहे

झेलते रहे सितम पर सितम
ये उम्र न घटी, हम जीते रहे

पिंजर में 'सीमा' के कैद हुए
उड़ने को पंख ये मचलते रहे

- सीमा
12-02-2017

Thursday, 9 February 2017

तेरी खातिर -----

आई हूँ जग में तेरी खातिर
जाऊँगी जग से तेरी खातिर

पढ़ें लिखे को चाहेे कितने
मैंने लिखा पर तेरी खातिर

हुनर न कोई लेकर मैं आई
मैंने सीखा सब तेरी खातिर

मुझ पर कितने जुल्म हुए
हँसके सहे सब तेरी खातिर

हर एक बंधन ठुकराया मैंने
लाँघी हर सीमा तेरी खातिर

कुछ भी अर्थ निकाले कोई
जीवन ये मेरा तेरी खातिर

विष का प्याला मिला मुझे
मैंने पिया पर तेरी खातिर

मूक नहीं थी रसना ये मेरी
सी ली पर मैंने तेरी खातिर

कर्ज है तेरा मुझ पर भारी
मैंने पाया जो भी तेरी खातिर

किस्मत हो चाहे कितनी शातिर
बदलेगी एक दिन मेरी खातिर

- सीमा

Sunday, 29 January 2017

जनमत

जनता की, जनता द्वारा,जनता के लिए बनती सरकार
स्वस्थ जनमत बनता सदा, लोकतंत्र का सबल आधार
करो देश की नींव सुदृढ़, अपने मत की ईंट रखो तुम
जागो देश के नौजवानो, एक नया इतिहास रचो तुम

Tuesday, 24 January 2017

आने वाला बसंत

शीत के इस कहर का, होने वाला बस अंत
कुछ ही दिन अब शेष हैं, आने वाला बसंत
सीमा