Tuesday, 23 May 2023

आज इस सूने हृदय में....

आज इस सूने हृदय में….

आज इस सूने हृदय में,
याद बस तेरी मचलती।
सोच हावी हो रिदय पर,
भाव हर कोमल कुचलती।

तुम हमारे कुछ नहीं, पर
याद आते हो सतत क्यों ?
सुन तुम्हारी मुश्किलों को
रह न पाते हम विरत क्यों ?

वेदना में देख तुमको,
क्यों नयन से पीर झरती ?
कलप उठतीं भावनाएँ,
वासना के चीर हरती।

क्यों हमें ये लग रहा है,
न अब कभी मिल पाएँगे।
नेह के वो पुष्प मन में,
न अब कभी खिल पाएँगे।

तुम हमें चाहो न चाहो,
दिल तुम्हें हम दे चुके हैं।
चाहना में घुल तुम्हारी,
हम तुम्हारे हो चुके है।

दुआ नित दिल से निकलती,
रहो सुखी संपन्न सदा।
कौन जाने भाग्य में पर,
क्या लिखा है, क्या बदा।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

कुछ मुक्तक....


कुछ मुक्तक…

(1)
भरे जो नेह की हाला, न प्याला वो कभी फूटे।
सिखाए जो सबक सच के, न शाला वो कभी छूटे।
खुशी जिनसे छलकती हो, जुड़ें वे तार सब मन के,
गुँथे मन-भाव हों जिसमें, न माला वो कभी टूटे।
(2)
डगर मुश्किल लगे कितनी, नहीं हटना पलट पीछे।
नजर में रख सदा मंजिल, बढ़े चलना नयन मींचे।
बहे विपरीत धारा के, वही पाता किनारा है,
न देना ध्यान दुनिया पर, भले अपनी तरफ खींचे।
(3)
उड़ानों का नहीं मतलब, गगन का नूर हो जाना।
भुलाकर दर्द अपनों के, खुशी में चूर हो जाना।
बड़े संघर्ष झेले हैं, तुम्हें काबिल बनाने में,
जिन्होंने पर दिए तुमको, उन्हीं से दूर हो जाना।
(4)
नियति ने कुछ नियत लमहे, हमें सबको नवाजे हैं।
कहीं कलरव कहीं मौना, कहीं घुटती अवाजें हैं।
कहीं दुख के विकल पल तो,कहीं नगमे खुशी के हैं,
कहीं काँधे चढ़े बच्चे, कहीं उठते जनाजे हैं।
(5)
मिली जिस काल आजादी, हुआ दिल चाक भारत का।
खुशी का पल गया करके, नयन नमनाक भारत का।
किए टुकड़े वतन के दो, हजारों जन हुए बेघर,
खिंची दीवार नफरत की, हुआ सुख खाक भारत का।
(6)
कभी थे फूल से कोमल, मगर अब शूल से लगते।
हुए जो दिल कभी इक जां, नदी के कूल से लगते।
तराने प्रेम के मेरे, मुझे ही आज छलते हैं,
बसी थी हर खुशी जिनमें, वही अब भूल से लगते।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Monday, 22 May 2023

किए जा सितमगर सितम मगर...


किए जा सितमगर सितम मगर….

किए जा सितमगर सितम मगर।
सर मेरे ये इल्जाम न कर।

जो जी में आए कर जी भर,
पर व्यर्थ मुझे बदनाम न कर।

गलती मुझसे जो हुयी नहीं,
जबरन वो मेरे नाम न कर।

हँसे न जग करनी पर तेरी,
ऐसा कोई तू काम न कर।

आपस की सब बातें अपनी,
कह बीच सभी के आम न कर।

मुझे गिरा नज़रों में सबकी,
ऊँचा तू अपना दाम न कर।

किया भरोसा तुझ पर मैंने,
उसका यूँ कत्ले आम न कर।

देख रहा करनी वह सबकी,
विधि को अपने तू वाम न कर।

आजा अब तो घर तू वापस,
काली जीवन की शाम न कर।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

ऐलान....

ऐलान कर दिया….

‘आजाद हो तुम आज से’, ऐलान कर दिया।
क्या अब कहें कहकर हमें, बेजान कर दिया।

नादान थे समझे नहीं, बातें जहर बुझी,
तुमने कहा हमने सुना, उस कान कर दिया।।

नाराजगी भी थी अगर, कहते हमें कभी
ये क्या कि बिन कुछ भी कहे, चालान कर दिया।

हमसे जफा करके दया, आयी नहीं तुम्हें !
कुछ तो कहो क्यों प्यार का, अपमान कर दिया।

टूटा हुआ दिल क्या करे, अवसाद के सिवा !
सिक्के उछाले प्यार का, भुगतान कर दिया।

बढ़ते गये नित फासले, किसकी लगी नजर !
लाकर खड़ा गम के हमें, दरम्यान कर दिया।

कितने सनम कर लो सितम, होता न अब असर,
नाजुक नरम दिल को पका, चट्टान कर दिया।

लाँघीं नहीं हमने कभी, तकरार में हदें,
ऊँचाइयाँ दे प्यार को, भगवान कर दिया।

देखा किए अनथक तुम्हें, हटती न थी नजर,
दिलो-जिगर अपना सभी, कुर्बान कर दिया।

दिल को यही इक रंज है, कैसे करे सबर,
महका हुआ हँसता चमन, वीरान कर दिया।

है स्वार्थ ही परमोधरम, जग का यही मरम,
इंसान को किसने यहाँ, हैवान कर दिया।

आना नहीं ‘सीमा’ कभी, अब इस जहान में,
अच्छे-बुरे हर कर्म का, भुगतान कर दिया।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Sunday, 21 May 2023

ऐलान कर दिया...

आजाद हो तुम आज से, ऐलान कर दिया।
क्या अब कहें कहकर हमें, बेजान कर दिया।

नादान थे समझे नहीं, बातें जहर बुझी,
तुमने कहा हमने सुना, उस कान कर दिया।।

नाराजगी भी थी अगर, कहते हमें कभी
ये क्या कि बिन कुछ भी कहे, चालान कर दिया।

हमसे जफा करके दया, आयी नहीं तुम्हें !
कुछ तो कहो क्यों प्यार का, अपमान कर दिया।

टूटा हुआ दिल क्या करे, अवसाद के सिवा !
सिक्के उछाले  प्यार का, भुगतान कर दिया।

बढ़ते गये नित फासले, किसकी लगी नजर !
लाकर खड़ा गम के हमें, दरम्यान कर दिया।

कितने सनम कर लो सितम, होता नहीं असर,
नाजुक नरम दिल को पका, चट्टान कर दिया।

तोड़ीं नहीं हमने कभी,  तकरार में हदें,
ऊँचाइयाँ दे प्यार को, भगवान कर दिया।

देखा किए अनथक तुम्हें, हटती न थी नजर,
दिलो-जिगर अपना सभी, कुर्बान कर दिया।

दिल को यही इक रंज है,  कैसे करे सबर,
महका हुआ हँसता चमन, वीरान कर दिया।

आँसू टपक झर-झर झरें, तुम पर नहीं असर,
हाजिर बला के स्वार्थ ने, फुरकान कर दिया।

है स्वार्थ ही परमोधरम, जग का यही मरम,
इंसान को किसने यहाँ,  हैवान कर दिया।

आना नहीं 'सीमा' कभी अब इस जहान में,
अच्छे बुरे हर कर्म का, भुगतान कर दिया।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Tuesday, 2 May 2023

चुनावी बयार...

अरे ये कौन नेता हैं, न आना बात में इनकी।

अरे ये कौन नेता हैं, न आना बात में इनकी।
पलट जाना मुकर जाना, लिखा है जात में इनकी।
कटोरा भीख का ले जब, चुनावी दौर में आएँ,
चटाना धूल तुम इनको, यही औकात है इनकी ।

जरूरत वोट की हो जब, गले लगते गरीबों के।
दिखाते भाव कुछ ऐसे, मसीहा हों गरीबों के।
नजर हटते पलट जाते, जरा देखो हँसी उनकी,
भिखारी से चले आते, भले बनते गरीबों के।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Monday, 1 May 2023

सूना आज चमन...

सूना आज चमन...

हौंस और उल्लास कहाँ अब,
बुझा-बुझा सा मन।
देख अभागी किस्मत अपनी,
रोता है  हर छन।

कितने अरमां कितने सपने,
नित अकुलाते थे।
पूरे होंगे सोच एक दिन,
हम इठलाते थे।
मधु-रसकण का वर्षण होगा,
था अनुमान सघन।

लदे सुखों से दिन थे जगमग,
हँसती थी राका।
अरमां भोले जब्त हुए सब,
पड़ा गजब डाका।
किर्च-किर्च सब ख्वाब हुए हैं,
चटक गया दरपन।

नहीं किसी से द्वेष हमें था,
सब तो थे अपने।
मिलजुलकर सब साथ रहेंगे,
देखे थे सपने।
रही मगर हर आस अधूरी,
सूना आज चमन।

दरकते आज रिश्ते-नाते,
कौन किसे जाने ?
रत हैं सभी स्वार्थ में अपने,
कौन किसे माने ?
रिसते छाले, बहते आँसू,
चुभते बिखरे कन।

चला कुचक्र नियति का ऐसा,
सूखा सुख-सागर।
रिस गया नेह-रस जीवन से,
रीती मन-गागर।
ताल मिला कर वक्त भाग्य से,
करे अजब नर्तन।

बँधी बहुत उम्मीद हमें थी,
सुख अब आएँगे।
दूर नहीं दिन जब खुशियों के,
बदरा छाएँगे।
ऐन वक्त पर सोयी किस्मत,
जाग उठी तड़पन।

खायी हमने मात सदा जो,
कमी हमारी थी।
सबको भला समझ लेने की,
हमें बिमारी थी।
दिल-दिमाग बिच इसी बात पर,
रहती नित अनबन।

सूना आज चमन....

© सीमा अग्रवाल, जिगर कॉलोनी, मुरादाबाद

"मनके मेरे मन के" से