Saturday, 18 June 2022
चंद दोहे....
Sunday, 8 May 2022
मेरी माँ...
माँ सच्ची संवेदना, माँ कोमल अहसास।
मेरे जीवन-पुष्प में, माँ खुशबू का वास।।
रंग भरे जीवन में जिसने, महकाया संसार।
पाला पोसा जानोतन से, दिया सुघड़ आकार।
खुश रही जो मेरी खुशी में, अपनी खुशी बिसार,
ममता की मूरत उस माँ पर, दूँ सर्वस्व निसार।
- © सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद
Monday, 7 February 2022
मतदान करो, मतदान करो
Wednesday, 12 January 2022
उठो, जागो, बढ़े चलो बंधु ( स्वामी विवेकानंद जी की जयंती के शुभ अवसर पर उनके द्वारा दिए गए उत्प्रेरक मंत्र से प्रेरित नर्मदा प्रकाशन से "वेदांत" काव्य संग्रह में प्रकाशित मेरी स्वरचित रचना )
Monday, 20 September 2021
भ्रातृ चालीसा....
Friday, 3 September 2021
कौन बचेगा इस धरती पर....
कौन बचेगा इस धरती पर…..
कुछ ख्वाब नयन में हैं बाकी,
क्या यहीं धरे रह जाएंगे ?
उनको पूरा करने फिर हम,
क्या लौट धरा पर आएंगे ?
बचा रहेगा भू पर जीवन,
या सब मिट्टी हो जाएगा ?
कौन बचेगा इस धरती पर,
ये कौन हमें बतलाएगा ?
हम न रहेंगे, तुम न रहोगे,
ऐसा भी इक दिन आएगा।
जितना मान कमाया जग में,
पल में स्वाहा हो जाएगा।
फिर से युग परिवर्तन होगा,
सतयुग फिर वापस आएगा।
कलयुग का क्या हश्र हुआ था,
जो शेष रहा, बतलाएगा।
जाते-जाते अब भी गर हम,
सत्कर्मो के बीज बिखेरें।
स्वार्थ त्याग कर मानवता के,
धरा-भित्ति पर चित्र उकेरें।
पूर्वजों का इस मिस अपने,
कुछ मान यहाँ रह जाएगा।
प्राण निकलते कष्ट न होगा,
अपराध-बोध न सताएगा।
अपने तुच्छ लाभ की खातिर,
पाप सदा करते आए हैं।
माँ धरती माँ प्रकृति का हम,
दिल छलनी करते आए हैं।
और नृशंसता कहें क्या अपनी,
रौंद दिए हमने वन- उपवन।
स्वार्थ में इतना गिर गए हम,
चले बाँधने जल और पवन।
जितना छला प्रकृति को हमने,
वो सब वापस उसे लौटा दें।
पाटीं नदियाँ खोल दें फिर से,
पंछियों के फिर नीड़ बसा दें।
फिर प्रकृति की बैठ गोद में,
नफरत-हिंसा-द्वेष मिटा दें।
आस भरे निरीह जीवों पर,
फिर से अपना प्यार लुटा दें।
साथ हमारे सृष्टि हमारी,
दुश्मन को ये भान करा दें।
फूट-नीति न चलाए हम पर,
इतना उसको ज्ञान करा दें।
हरियाली जग में छाएगी,
महामारी टिक न पाएगी।
नेह बढ़ेगा संग प्रकृति के,
समरसता वापस आएगी।
“काव्य पथ” से
– © डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )
Monday, 30 August 2021
कृपाण घनाक्षरी ( श्री कृष्ण जन्म )
श्रीकृष्ण जन्म…
कृपाण घनाक्षरी (श्रीकृष्ण जन्म)…
मैया की पीन पुकार
सुनते थे बारंबार
करने पाप संहार
आए स्वयं इस बार
छुपी प्रलय वृष्टि में
हलचल थी सृष्टि में
दृश्य अद्भुत दृष्टि में
हुए जो प्रभु साकार
द्वारपाल सब सोए
आगत नैन संजोए
वक्त हार-पल पोए
खुल गए सारे द्वार
मिला मुक्ति का संदेश
दिखा नया परिवेश
हर्षित देव-देवेश
करते जै जयकार
२- हे प्रभु मुझे उबार….
अद्भुत यह संसार ,
समझ न आए पार
नैया फँसी मझधार,
कर प्रभु बेड़ा पार
लेकर धर्म की आड़,
करें सभी खिलवाड़
मिटाए मिटे न राड़,
बढ़ रहा अँधियार
सबकी अपनी शान,
सबका अपना मान
सभी हैं गुणों की खान,
करते धन से वार
बढ़ रहे अत्याचार,
मची कैसी मारामार
मिटा जगती का भार,
हे प्रभु, ले अवतार
३-
आ गयी मैं तेरे द्वार
करूँ श्याम मनुहार,
सुन ले पीन पुकार
कर दे रे बेड़ा पार
तू ही जीवन आधार,
तुझसे ही ये संसार
है तू ही खेवनहार,
थाम मेरी पतवार
अद्भुत रचा प्रपंच,
दिखाई दया न रंच
कैसा रे, तू सरपंच
है सत्य जहाँ लाचार
कोई नहीं सच्चा मीत
झूठी है सबकी प्रीत
कैसे निभे कोई रीत
घिरा घना अँधियार
– © सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ0प्र0)
” मनके मेरे मन के ” से