Saturday, 18 June 2022

चंद दोहे....


सच को शूली पर चढ़ा, सत्ता गाल बजाय।
शातिर अपनी चाल चल, दूर खड़ा मुस्काय।।

चाल तुम्हारी चल गयी, हुए घाघ से शेर।
सवा सेर जिस दिन मिला, हो जाओगे ढेर।।

अपनी सुविधा के लिए, करे और पर वार।
परदुख का कारण बने, पड़े वक्त की मार।।

अपनी गलती को छुपा, मढ़ें और पर दोष।
बुद्धिमत्ता दिखा रहे, खाली जिनका कोष।।

© सीमा अग्रवाल
जिगर कॉलोनी,
मुरादाबाद ( उ.प्र.)

Sunday, 8 May 2022

मेरी माँ...

माँ सच्ची संवेदना, माँ कोमल अहसास।
मेरे जीवन-पुष्प में, माँ खुशबू का वास।।

रंग भरे जीवन में जिसने,     महकाया संसार।

पाला पोसा जानोतन से, दिया सुघड़ आकार।

खुश रही जो मेरी खुशी में, अपनी खुशी बिसार,

ममता की मूरत उस माँ पर, दूँ सर्वस्व निसार।

- © सीमा अग्रवाल

मुरादाबाद

Monday, 7 February 2022

मतदान करो, मतदान करो

रहो जागरूक  नित मतदाता।
तुम्हीं भारत के भाग्य विधाता।
निज हित जब ऊपर हो जाते,
देश  रसातल  में  धँस जाता।

सोच समझ करना मतदान,
क्षुद्र स्वार्थ न करे कल्याण।
चुनकर लाना  वो  सरकार,
करे   देश  का  नवनिर्माण।

मत देना अधिकार तुम्हारा
दुरुपयोग ना इसका करना
लोकतंत्र को सफल बनाना
सर्वथा योग्य पर मुहर लगाना

जन-जन के सजग प्रयासों से
भविष्य देश का सँवर उठेगा।
शत-प्रतिशत मतदान से सच्चे
एक कर्मठ नेता हमें मिलेगा।
- © सीमा अग्रवाल

Wednesday, 12 January 2022

उठो, जागो, बढ़े चलो बंधु ( स्वामी विवेकानंद जी की जयंती के शुभ अवसर पर उनके द्वारा दिए गए उत्प्रेरक मंत्र से प्रेरित नर्मदा प्रकाशन से "वेदांत" काव्य संग्रह में प्रकाशित मेरी स्वरचित रचना )

उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु...

उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु, 
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

सपने सतरंगी आगत के,
सजें तुम्हारी आँखों में।
जज्बा जोश लगन सब मिलकर,
भर दें उड़ान पाँखों में।

रखकर गंतव्य निगाहों में,
अर्जुन सम तीर चलाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु, 
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

तुम युवक ही रीढ़ समाज की,
टिका है भविष्य तुम्हीं पर।
तुम्हीं देश के कर्णधार हो,
नजरें सभी की तुम्हीं पर।

निज ऊर्जा, महत्वाकांक्षा से
ऊँचा तुम इसे उठाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु, 
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

मंजिल चूमे कदम तुम्हारे,
भरी हो खुशी से झोली।
देख तुम्हारे करतब न्यारे,
नाचें  झूमें  हमजोली।

देश तरक्की करे चहुँमुखी,
अग जग में मान बढ़ाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु, 
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

कुदरत के लघु अवयव को भी,
क्षति न कभी तुम पहुँचाना।
पूज चरण पीपल-बरगद के,
बैठ छाँह में सुस्ताना।

दीन-हीन निरीह जीवों को,
जीवन की आस बँधाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु, 
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।

असामाजिक तत्व समाज के
खड़े राह को रोकें तो,
डाह भरे निज सम्बन्धी भी
छुरा पीठ में भोंकें तो,

करके नजरंदाज सभी को
पथ अपना सुगम बनाओ।
उठो-जागो-बढ़े चलो बंधु, 
न जब तक लक्ष्य तुम पाओ।
- ©® डॉ0 सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)
" वेदांत " से

Monday, 20 September 2021

भ्रातृ चालीसा....

भ्रातृ-चालीसा --

भाई घर की शान है, बहनों का अभिमान।
भाई में बसती सदा,  हम बहनों की जान।।

रिश्ता भाई-बहन का, सबसे पावन जान।
इसके जैसा जगत में, मिले नहीं परमान।।

सबसे  उजला   निर्मल  नाता।
भाई-बहन का जग-विख्याता।।१।।

भाँति-भाँति के जन जगती में।
भाँति-भाँति के मन जगती में ।।२।।

नियामकों  ने   नियम  बनाए।
सोच-समझ  परिवार   बनाए ।।३।।

चुन-चुन  गढ़ीं  सुदृढ़  इकाई।
मात- पिता, भगिनी औ भाई।।४।।

एक  वृंत  पर  खिले दो  फूल।
एक  ही   मृदा  एक  ही  मूल।।५।।

सबसे  प्यारा   नाता  जग  में।
एक  खून   दौड़े   रग-रग  में।।६।।

रिश्ता  है  ये   सबसे   पावन।
जैसे  सब  मासों   में  सावन।।७।।

एक  मातु  के  हम-तुम  जाये।
अपने  साथ  मुझे   तुम  लाये।।८।।

लिखे- पढ़े- खेले   संग - संग।
देखे   जीवन    के   रंग - ढंग।।९।।

तुम   बचपन  के  साथी  मेरे।
अंत समय तक रहो संग मेरे।।१०।।

आँख खुली  तो  देखा तुमको।
आँख  मुँदे तक  देखूँ  तुमको।।११।।

भाई   तुम  रक्षक  बहनों  के।
तारे   हो   उनके   नयनों  के।।१२।।

तुम्ही  बहन  के  पहले   हीरो।
तुम बिन दुनिया लगती जीरो।।१३।।

बुरी  नजर  से  देखा  जिसने।
सबक सिखाया उसको तुमने।।१४।।

तुम  पर  कोई  आँच  न आए।
हर  मुश्किल  से  प्रभु  बचाए।।१५।।

साथ  तुम्हारा  नित  बना रहे।
ये  माथ  युगों  तक  तना रहे।।१६।।

राखी   सदा   कलाई    सोहे।
बहना  हर   पल  रस्ता  जोहे।।१७।।

जब-जब मुझपे विपदा आई।
दौड़े   आये,  न    देर  लगाई।।१८।।

जब-जब गिरा  मनोबल मेरा।
पाया  तब - तब  संबल  तेरा।।१९।।

पति, संतान,  पिता या  माता।
कोई न इतना   साथ निभाता।।२०।।

अश्रु  बहन  के  देख  न पाते।
सम्मुख विधि के अड़ तुम जाते।।२१।।

बिना स्वार्थ  दौड़े  तुम  आते।
पिता तुल्य सब फर्ज निभाते।।२२।।

तुमसे    रिश्ते-नाते   औ   रस।
तुम बिन दुनिया  होती  नीरस।।२३।।

भाई -दूज   पर्व   अति  पावन।
भर  जाता  खुशियों  से दामन।।२४।। 

शरारतें    यादें    मन   भावन।
राखी   लेकर  आता   सावन।।२५।।

स्मृतियाँ बचपन  की  लुभाएँ।
परत दर परत  खुलती  जाएँ।।२६।।

सोंधी-सुगंधित-सरस-सुवास। 
तन-मन में  भर देती  उजास।।२७।।

निज बहन की आन की खातिर।
रावण  रहा  सदा  ही  हाजिर।।२८।।

रखी  बहन के नेह  की  लाज।
वीर  हुमायूँ   पर   हमें  नाज ।।२९।।

हर  नाते  से   बढ़कर   भ्राता।
हर  विपदा  में  बनता   त्राता।।३०।।

माँगूँ  एक  न   हिस्सा  तुमसे।
जुड़े  रहो   तुम  पूरे    मुझसे।।३१।।

बना  रहे  नित  नेह   तुम्हारा।
बना  रहे  घर   बार   तुम्हारा।।३२।।

बँधी  कलाई   नेहिल  राखी।
बने अतुलित प्रेम की साखी।।३३।।

धीर  गंभीर  अति  बलशाली।
रहो सुखी  नित  वैभवशाली।।३४।।

भाई  तुम  पर   नेह  अगाधा।
हर सुख-दुख तुमने ही साधा।।३५।।

मात-पिता का  तुम्हीं  सहारा।
तुम बिन उनका कहाँ गुजारा।।३६।।

धुरी  तुम्हीं   हो   पूरे  घर  की।
पाओ खुशियाँ दुनिया भर की।।३७।।

कभी  न अपना  नेह छुड़ाना।
कभी बहन को भूल न जाना।।३८।।

बच्चों  के  तुम  मामा  प्यारे।
तुम  चंदा  तो   वो  हैं  तारे।।३९।।

सब  बहनों  के  प्यारे  भाई।
कृपा करें  तुम  पर  रघुराई।।४०।।

धन-धान्य  भरपूर रहे, रहे  कुशल  आबाद।
सुखी-स्वस्थ-समृद्ध रहे, दो प्रभु आशीर्वाद।।

जुग-जुग तक जग में रहें, मुद-मंगल त्यौहार।
मन-मानस करते रहें,    खुशियों की बौछार।।

- सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)
"मनके मेरे मन के" से
(सर्वाधिकार सुरक्षित )

Friday, 3 September 2021

कौन बचेगा इस धरती पर....

कौन बचेगा इस धरती पर…..

कुछ ख्वाब नयन में हैं बाकी,
क्या यहीं धरे रह जाएंगे ?
उनको पूरा करने फिर हम,
क्या लौट धरा पर आएंगे ?

बचा रहेगा भू पर जीवन,
या सब मिट्टी हो जाएगा ?
कौन बचेगा इस धरती पर,
ये कौन हमें बतलाएगा ?

हम न रहेंगे, तुम न रहोगे,
ऐसा भी इक दिन आएगा।
जितना मान कमाया जग में,
पल में स्वाहा हो जाएगा।

फिर से युग परिवर्तन होगा,
सतयुग फिर वापस आएगा।
कलयुग का क्या हश्र हुआ था,
जो शेष रहा, बतलाएगा।

जाते-जाते अब भी गर हम,
सत्कर्मो के बीज बिखेरें।
स्वार्थ त्याग कर मानवता के,
धरा-भित्ति पर चित्र उकेरें।

पूर्वजों का इस मिस अपने,
कुछ मान यहाँ रह जाएगा।
प्राण निकलते कष्ट न होगा,
अपराध-बोध न सताएगा।

अपने तुच्छ लाभ की खातिर,
पाप सदा करते आए हैं।
माँ धरती माँ प्रकृति का हम,
दिल छलनी करते आए हैं।

और नृशंसता कहें क्या अपनी,
रौंद दिए हमने वन- उपवन।
स्वार्थ में इतना गिर गए हम,
चले बाँधने जल और पवन।

जितना छला प्रकृति को हमने,
वो सब वापस उसे लौटा दें।
पाटीं नदियाँ खोल दें फिर से,
पंछियों के फिर नीड़ बसा दें।

फिर प्रकृति की बैठ गोद में,
नफरत-हिंसा-द्वेष मिटा दें।
आस भरे निरीह जीवों पर,
फिर से अपना प्यार लुटा दें।

साथ हमारे सृष्टि हमारी,
दुश्मन को ये भान करा दें।
फूट-नीति न चलाए हम पर,
इतना उसको ज्ञान करा दें।

हरियाली जग में छाएगी,
महामारी टिक न पाएगी।
नेह बढ़ेगा संग प्रकृति के,
समरसता वापस आएगी।

“काव्य पथ” से
– © डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Monday, 30 August 2021

कृपाण घनाक्षरी ( श्री कृष्ण जन्म )

श्रीकृष्ण जन्म…

कृपाण घनाक्षरी (श्रीकृष्ण जन्म)…

मैया की पीन पुकार
सुनते थे बारंबार
करने पाप संहार
आए स्वयं इस बार

छुपी प्रलय वृष्टि में
हलचल थी सृष्टि में
दृश्य अद्भुत दृष्टि में
हुए जो प्रभु साकार

द्वारपाल सब सोए
आगत नैन संजोए
वक्त हार-पल पोए
खुल गए सारे द्वार

मिला मुक्ति का संदेश
दिखा नया परिवेश
हर्षित देव-देवेश
करते जै जयकार

२- हे प्रभु मुझे उबार….

अद्भुत यह संसार ,
समझ न आए पार
नैया फँसी मझधार,
कर प्रभु बेड़ा पार

लेकर धर्म की आड़,
करें सभी खिलवाड़
मिटाए मिटे न राड़,
बढ़ रहा अँधियार

सबकी अपनी शान,
सबका अपना मान
सभी हैं गुणों की खान,
करते धन से वार

बढ़ रहे अत्याचार,
मची कैसी मारामार
मिटा जगती का भार,
हे प्रभु, ले अवतार

३-
आ गयी मैं तेरे द्वार
करूँ श्याम मनुहार,
सुन ले पीन पुकार
कर दे रे बेड़ा पार

तू ही जीवन आधार,
तुझसे ही ये संसार
है तू ही खेवनहार,
थाम मेरी पतवार

अद्भुत रचा प्रपंच,
दिखाई दया न रंच
कैसा रे, तू सरपंच
है सत्य जहाँ लाचार

कोई नहीं सच्चा मीत
झूठी है सबकी प्रीत
कैसे निभे कोई रीत
घिरा घना अँधियार

– © सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ0प्र0)
” मनके मेरे मन के ” से