Saturday, 19 June 2021

रात बदरिया घिर-घिर आए...

रात  बदरिया  घिर - घिर  आए
पास  न   कोई   दिल   घबराए

बागी  हुआ     निगोड़ा  मौसम
आ  धमकाए    लाज  न  आए

उफ   कैसी   मनहूस   घड़ी  है
बात - बात  पर  जी  अकुलाए

बेढब   चालें     चलती   दुनिया
बिना  बात   ही     बात  बनाए

बुझी - बुझी   सी   लगे  चाँदनी
करके   इंगित     पास    बुलाए 

किस  गम   में    डूबा   है  चंदा
फिर-फिर आए  फिर-फिर जाए

विरह - भुजंगम     टले  न  टाले
बैठा    भीतर       घात    लगाए

बैन   रुँधे   हैं    नैन    पिपासित
रैन  न  जाए         चैन  न  आए

क्या - क्या  और    देखना बाकी
'सीमा' गम की        कौन बताए

- सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)
"मनके मेरे मन के" से

Tuesday, 15 June 2021

तुम ना आए....

तुम ना आए...√

उग आया लो चाँद गगन में
तुम ना आए
खोई  तुममें  रही  मगन  मैं
तुम ना आए

याद करो  तुम ही कहते थे
साँझ ढले  घर आ जाऊँगा
निकलेगा जब  चाँद गली में
मैं तुमसे मिलने आऊँगा
            लो, आया वो चाँद गली में
            तुम ना आए....

बिना तुम्हारे गम सहकर भी
हमने जग  के  फर्ज  निभाए
अवधि गिन-गिन जिए रहे हम
जीवन के सब कर्ज चुकाए
        देखा तुमको चाँद - झलक में
        तुम ना आए....

बड़ी खुशी से संग सखी के
हमने  सब  सिंगार  सजाए
वेणी  गूँथी    माँग   सजाई
जड़े  सितारे     हार  बनाए
        उलझ गया लो चाँद अलक में
        तुम ना आए....

गुजरीं   कितनी  पूरनमासी
कितनी घोर अमावस आयीं
शिशिर-हेमंत-बसंत-पतझर
षड्ऋतु आतप-पावस छायीं
        आँसू  आ-आ रुके पलक में
        तुम ना आए
        डूब गया लो  चाँद फलक में
        तुम ना आए....
-डॉ.सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)
https://hindi.sahityapedia.com/user/seema0806

Tuesday, 8 June 2021

स्वरचित दोहे...

दोहे....

सावन आया देखकर, हर्षित दादुर मोर।
चंदा बदली में छुपा,   रोता फिरे चकोर।।१।।

अबके सावन करो प्रभु, करुणा की बरसात।
शाख  ना  टूटे  कोई,   हुलसें  घर-घर  पात।।२।।

सब जन विकार मुक्त हों, धुल जाएँ सब पाप।
बह जाए ये वायरस,      मिट जाएँ भव-ताप।।३।।

मेघ बरसते देखकर,       मन में उगा विचार।
जग के सब कल्मष बहें, रहे न लेश विकार।।४।।

हर ले मलिनता सारी,    बारिश की बौछार।
मन-गंगा निर्मल बहे,      तर जाएँ नर-नार।।५।।

महामारी में लिपटी,  देख धरा लाचार।
रोए गगन भी देखो,  आँसू नौ-नौ धार।।6।।

जिस अदने वायरस ने,    छीने होश-हवास।
अबकी बारिश जल मरे, जैसे आक-जवास।।७।।

वर्षा जीवन-दायिनी,      तप्त धरा की आस।
सकल चराचर जगत की, यही बुझाए प्यास।।८।।

पानी बिन जीवन नहीं, वर्षा जल की खान।
बूँद-बूँद  संग्रह करो, इसका   अमृत  जान।।९।।

-डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Saturday, 5 June 2021

आज तुम्हें फिर देखा हमने...

आज तुम्हें फिर देखा हमने...

आज तुम्हें फिर देखा हमने
तड़के अपने ख्वाब में
छुप कर बैठे हो तुम जैसे
मन के कोमल भाव में

किस घड़ी ये जुड़ गया नाता
तुम बिन रहा नहीं अब जाता
कब समझे समझाने से मन
हर पल ध्यान तुम्हारा आता

जहाँ भी जाएँ पाएँ तुम्हें
निज पलकन की छाँव में

क्यों तुम इतने अच्छे लगते
मन के कितने  सच्चे लगते
छल-कपट से दूर हो इतने
भोले  जितने  बच्चे  लगते

मरहम बनकर लग जाते हो
जग से पाए घाव में

तुम पर  कोई  आँच न आए
बुरी  नजर  से  प्रभु  बचाए
स्वस्थ रहो खुशहाल रहो तुम
दामन सुख से भर-भर जाए

यूँ ही आते-जाते रहना
मेरे मन के गाँव में...

-सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Sunday, 30 May 2021

जब आया बरसात का मौसम...

https://hindi.sahityapedia.com/?p=137345

जब आया बरसात का मौसम...

जब आया  बरसात  का मौसम
घिर आया  जज्ब़ात का मौसम

उँगली अधर  पर  धरता  आया
मन से  मन की बात का मौसम

खड़ा द्वार  ज्यों  दे रहा  दस्तक
प्रेम- सनी   सौगात का  मौसम

संग  चाँदनी   छिप  गया  चंदा
घुप  अँधियारा  रात का मौसम
                     
याद आ फिर-फिर मुझे  सताए
हुई  उनसे  हर  बात का मौसम

दिल पर छाप अमिट छोड़ गया
इक हसीं  मुलाकात का मौसम

वो छुवन मृदुल  मधुर आलिंगन
भूलूँ    न  जुमेरात  का   मौसम

मीठी  अगन में  झुलसे  विरहन
रूठा  सुकूं-हयात   का  मौसम

मुरझी   आस   बरसें  दो   नैना
यादों   की   बारात  का  मौसम

बरसे  कहीं    पर  यहाँ न आए
भीख-दया-खैरात   का  मौसम

नाजुक  मन  ये  सहे  तो  कैसे
पाहन  सम आघात का मौसम

-सीमा अग्रवाल
जिगर कॉलोनी
मुरादाबाद (उ.प्र.)

Thursday, 13 May 2021

कोरोना काले.....

कल क्या होगा ?

कुछ ख्वाब नयन में हैं बाकी
क्या यहीं धरे रह जाएंगे ?
उनको पूरा करने फिर हम
क्या लौट धरा पर आएंगे ?

बचा रहेगा भू पर जीवन
या सब मिट्टी हो जाएगा ?
कौन बचेगा इस धरती पर
ये कौन हमें बतलाएगा ?

हम न रहेंगे, तुम न रहोगे
ऐसा भी इक दिन आएगा
जितना मान कमाया जग में
पल में स्वाहा हो जाएगा

फिर से युग परिवर्तन होगा
सतयुग फिर वापस आएगा
कलयुग का क्या हश्र हुआ था
जो शेष रहा, बतलाएगा

जाते-जाते अब भी गर हम
सत्कर्मो के बीज बिखेरें
स्वार्थ त्याग कर मानवता के
धरा-भित्ति पर चित्र उकेरें

पूर्वजों का इस मिस अपने
कुछ मान यहाँ रह जाएगा
प्राण निकलते कष्ट न होगा
अपराध-बोध न सताएगा

अपने तुच्छ लाभ की खातिर
पाप सदा करते आए हैं
माँ धरती, माँ प्रकृति का हम
दिल छलनी करते आए हैं

जितना छला प्रकृति को हमने
वो सब वापस उसे लौटा दें
पाटीं नदियाँ खोल दें फिर से
पंछियों के फिर नीड़ बसा दें

फिर गोद में बैठ प्रकृति की
नफरत-हिंसा-द्वेष मिटा दें
आस भरे निरीह जीवों पर
फिर से अपना प्यार लुटा दें
-सीमा अग्रवाल