रोशनी पाकर सूरज से
ज्यों गगन में चाँद चमकता
जब तुम चमकोगे जग में
मैं खुद रोशन हो जाऊंगी ।
साँझ घिरे तो छुपा लूंगी
प्यार से तुम्हें आँचल में अपने
भोर होते ही मिटा खुद को
तुम में ओझल हो जाऊंगी
- सीमा
रोशनी पाकर सूरज से
ज्यों गगन में चाँद चमकता
जब तुम चमकोगे जग में
मैं खुद रोशन हो जाऊंगी ।
साँझ घिरे तो छुपा लूंगी
प्यार से तुम्हें आँचल में अपने
भोर होते ही मिटा खुद को
तुम में ओझल हो जाऊंगी
- सीमा
अब तक तो भ्रम में जीता था
पर अब ये दिल ने जाना है
दौड़ रहा जिस सुख के पीछे
वो अपना कहाँ बेगाना है !
मोहक उसने जाल बिछाया
कैसा सुंदर ख्वाब दिखाया
जब आँख खुली तो मैंने पाया
हर सूं पसरा वीराना है !
समझ न थी नादां दिल को
छूने चला ऊँची मंजिल को
मूंदता रहा सच से आँखें
हुआ कैसा ये दीवाना है !
मुद्दत हुई जब मिलीं थीं खुशियाँ
अब तो मिलती इक झलक नहीं
मेहमां दूर का हो गयी निंदिया
पल भर भी लगती पलक नहीं
लगा रहता इस तन्हा दिल में
बस गम का आना- जाना है !
कभी खेले थे साथ हमारे
खूब गगन के चाँद सितारे
आगोश में अपने लेने को
खड़ी थीं बहारें बाँह पसारे
आज सभी ने किया किनारा
सब किस्मत का फसाना है !
कैसे सुनाऊँ अपनी कहानी
सुख से सदा रही अनजानी
सावन- सा बन लुटाया जीवन
जग ने फिर भी कदर ना जानी
खुशियों का नकाब पहने
अश्कों का ताना- बाना है !
दौड़ रहा मन जिसके पीछे
वो अपना कहाँ बेगाना है !
- सीमा अग्रवाल
हँसी न आने दी अधरों पर,
अश्कों पर भी रोक लगा दी !
ए मेरे निष्ठुर भाग्य-विधाता,
मुझे तुमने ये कैसी सज़ा दी !
कैसे इठलाते फिरते थे
रोके न किसी के रुकते थे
दिल में मचलते अरमानों की
अर्थी ही हाय ! उठा दी !
अंधड़ आया, बादल गरजे,
और टूटकर बरसा पानी !
नन्हें, नाजुक सपनों की,
सबने मिल हस्ती मिटा दी !
कितने प्यारे दिन थे आए
मन ने अनगिन ख्वाब सजाए
कान भरे किस्मत के किस ने
उसने लिखी हर खुशी मिटा दी !
प्यार ही तो माँगा था अपना
दौलत तो कभी ना माँगी थी
क्यूँ अनचाहा देकर मुझको
अनजानी सी राह दिखा दी !
चैन आए अब कैसे दिल को
कैसे आँखों में निंदिया आए
मसलकर मेरे सुख की कलियाँ
क्यों काँटों की सेज बिछा दी !
क्यूँ आए अब हँसी लबों पर
क्यूँ मन ये झूमे, नाचे, गाऐ
सुला कर मेरी किस्मत तुमने
सोई हुई हर पीर जगा दी !
स्नेह-सागर यूँ तो छलक रहा
पर पहुँच ना उस तक कोई मेरी
बुझ ना सकेगी जो जनम- जनम
क्यों मन में ऐसी प्यास जगा दी !
---सीमा अग्रवाल---
राम नहीं, रावन भी नहीं
बस तुममें तुमको देखा है !
सबसे अलग सबसे जुदा
बस हमने तुमको देखा है !
छल नहीं, कोई छद्म नहीं
अहं नहीं, कोई दंभ नहीं
स्नेहिल नजरों से मंद-मंद
मुस्कुराते तुमको देखा है !
धवल चंद्र सम रूप तुम्हारा
वृत्त ज्यों निर्मल जल की धारा
स्त्रवनों में मधुरिम बतियों का
रस ढुलकाते तुमको देखा है !
यूँ तो दूर बहुत तुम पास नही
मिलने की भी कोई आस नहीं
आँखें मूंद पर जब भी देखा
अपने दिल में तुमको देखा है !
लुकते, छिपते, ओझल होते
कभी शांत कभी चंचल होते
इंदु सम अपने मन-मानस में
नित अठखेली करते देखा है !
तुम छाए हो जग में चाँद बन कर
आ रही चाँदनी मुझ तक छन कर
ऐसा प्यारा एक सपन सलोना
तड़के ही आँखों ने मेरी देखा है !
दुहाई यहाँ आने की तुम्हारे
दे रहे हैं ये पदचिन्ह तुम्हारे
अभी अभी हाँ अभी तो यहीं
मुक्त विचरते तुमको देखा है !
---- सीमा ----
राम नहीं, रावन भी नहीं
बस तुममें तुमको देखा है !
सबसे अलग सबसे जुदा
बस हमने तुमको देखा है !
छल नहीं, कोई छद्म नहीं
अहं नहीं, कोई दंभ नहीं
स्नेहिल नजरों से मंद मंद
मुस्कुराते तुमको देखा है !
धवल चंद्र सम रूप तुम्हारा
वृत्त ज्यों निर्मल जल की धारा
श्रवनों में मधुरिम बतियों का
रस ढुलकाते तुमको देखा है !
यूँ तो दूर हो तुम पास नही
मिलने की कोई आस नहीं
आँख मूंदकर पर जब देखा
इस दिल में तुमको देखा है !
--- सीमा ---
हँसी न आने दी अधरों पर,
अश्कों पर भी रोक लगा दी !
ए मेरे निष्ठुर भाग्य-विधाता,
मुझे तुमने ये कैसी सज़ा दी !
कैसे इठलाते फिरते थे
रोके न किसी के रुकते थे
दिल में मचलते अरमानों की
अर्थी ही हाय ! उठा दी !
अंधड़ आया, बादल गरजे,
और टूटकर बरसा पानी !
नन्हें, नाजुक सपनों की,
सबने मिल हस्ती मिटा दी !
कितने प्यारे दिन थे आए
मन ने अनगिन ख्वाब सजाए
कान भरे किस्मत के किस ने
उसने लिखी हर खुशी मिटा दी !
प्यार ही तो माँगा था अपना
दौलत तो कभी ना माँगी थी
क्यूँ अनचाहा देकर मुझको
अनजानी सी राह दिखा दी !
चैन आए अब कैसे दिल को
कैसे आँखों में निंदिया आए
मसलकर मेरे सुख की कलियाँ
क्यों काँटों की सेज बिछा दी !
क्यूँ आए अब हँसी लबों पर
क्यूँ मन ये झूमे, नाचे, गाऐ
सुला कर मेरी जागी किस्मत
सोई हुई हर पीर जगा दी !
-----सीमा अग्रवाल-----