Tuesday, 20 January 2026

बात है ये उन दिनों की...

बात है ये उन दिनों की...

उन दिनों की बात में रस।
उन दिनों की रात में रस।
उन दिनों मौसम हसीं था,
उन दिनों बरसात में रस।

उन दिनों बातें निराली।
उन दिनों रातें उजाली।
उन दिनों सब कुछ सुखद था,
उन दिनों हर ओर लाली।

उन दिनों हर दिन रँगीला।
उन दिनों सावन सजीला।
साँझ पलकों पर उतरती,
आँजती अंजन लजीला।

उन दिनों हँसना सरल था।
भावभीना   मन तरल था।
बोल अमृत से सने थे,
उन दिनों कब ये गरल था।

उन दिनों को याद करते,
आँख से आँसू बरसते।
उन दिनों की बात क्या,अब
बात करने को तरसते।

अब भरे हों माल कितने,
पर कहाँ दिल में जगह है।
बेवजह बस हँस रहे हैं,
अब कहाँ सुख की वजह है।

अब सभी सुख साज घर में
पर कहाँ सुख उन दिनों सा।
हर   तरफ   वीरानगी   है,
घुप  तमस  है  दुर्दिनों  सा।

आज भी ठहरे वहीं हम,
उन दिनों को जी रहे हैं।
रिस रहा हर पोर से जो,
अर्क  नेहिल  पी  रहे हैं।

हूक सी मन में उठी है,
उन दिनों को छीन लाएँ।
टूटकर छिटकी कहीं जो,
हर कड़ी वो बीन लाएँ।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Thursday, 15 January 2026

सर्द महीना माघ...

पौष मास को कर विदा, आया देखो माघ।
बैठा जम कर जिन्न सा, लगता कैसा  घाघ।।

बर्फ पहाड़ों पर गिरी,         ठिठुर रहे मैदान।
पाला खुशियों पर पड़ा, सिकुड़ रहे अरमान।।

कुहरा छाया दूर तक,   दिखा रहा है ताव।
माघी शीतल चाँदनी, करती उर पर घाव।।

सर्दी देखो माघ की, जमी पड़ीं सब झील।
कुहरे ने तांडव रचा,  खुशियाँ सारी लील।।

माघ मास पाला पड़ा, बढ़ता अनुदिन शैत्य।
धरा अनवरत खोजती, छुपे कहाँ आदित्य ?।।

सोकर बीतें शीत में,  सुबह-दुपहरी-शाम।
हाथ-पाँव चलते नहीं, कैसे सिमटें काम।।

लुढ़का पारा शून्य पर, कुहर-शीत की धूम।
सूरज भी आया मनो,  सर्द हिमालय चूम।।

पाला पड़ा दिमाग पर, हाथ-पाँव सब सुन्न।
बिस्तर में दुबके हुए,       सभी पड़े हैं टुन्न।।

माघ मास की शीत है,     चलीं हवाएँ सर्द।
ठिठुर-ठिठुर कर हो रहा, चंद्रानन भी जर्द।।

शीत यामिनी माघ की,  गिरा रही थी गाज।
हिमखंडों को चीरता, निकला सूरज आज।।

बरस रही है व्योम से, नाजुक नरम निदाघ।
कुछ दिन के आतिथ्य पर, सर्द महीना माघ।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Sunday, 11 January 2026

सर्द महीना माघ...

पौष मास को कर विदा, आया देखो माघ।
बैठा जम कर जिन्न सा, लगता कैसा  घाघ।।

कुहरा छाया दूर तक,  दिखा रहा है ताव।
माघी शीतल चाँदनी, करती उर पर घाव।।

सर्दी देखो माघ की, जमी पड़ीं सब झील।
कुहरे ने तांडव रचा,  खुशियाँ सारी लील।।

माघ मास पाला पड़ा, बढ़ता अनुदिन शैत्य।
धरा अनवरत खोजती, छुपे कहाँ आदित्य ?।।

सोकर बीतें शीत में,  सुबह-दुपहरी-शाम।
हाथ-पाँव चलते नहीं, कैसे सिमटें काम।।

लुढ़का पारा शून्य पर, कुहर-शीत की धूम।
सूरज भी आया मनो,  सर्द हिमालय चूम।।

पाला पड़ा दिमाग पर, हाथ-पाँव सब सुन्न।
बिस्तर में दुबके हुए,       सभी पड़े हैं टुन्न।।

माघ मास की शीत है,    चलीं हवाएँ सर्द।
ठिठुर-ठिठुर कर हो रहा, चंद्रानन भी जर्द।।

शीत यामिनी माघ की,  गिरा रही थी गाज।
हिमखंडों को चीरता, निकला सूरज आज।।

बरस रही है व्योम से, नाजुक नरम निदाघ।
कुछ दिन के आतिथ्य पर, सर्द महीना माघ।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)