Tuesday, 6 January 2015

मैं हूँ उसकी सीमा विस्तार है वो मेरा

कह दो इन आँसुओं से, वापस न आना
मुझे साथ सनम के, भाता है मुस्कुराना !

रूठा है न जाने, आज क्यों वो मुझसे
तेवर तो देखो उसके, कैसे कातिलाना !

जाऊँ कहाँ मैं ये तो, जानता है वो भी
उस बिन न जहां में, कोई मेरा ठिकाना !

लाख जतन कर कर के, हाय ! मैं तो हारी
कोई तो सिखाए, कैसे है उसे मनाना !

मैं हूँ उसकी सीमा, विस्तार है वो मेरा
किस ओर उसे मैं ढूँढू, कहाँ उसका आशियाना !

-सीमा अग्रवाल

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