Tuesday, 6 January 2015

ये चोला तो जर्जर लगता है

सूना सूना ये जग लगता है
तुम बिन तनहा डर लगता है
नींद नहीं आती आँखों में,
हर सपना बंजर लगता है ।

पास बुला लो गले से लगा लो
हमको अपने साथ सुला लो
फिरा लेना यूँ नजरें तुम्हारा,
दिल पर बन खंजर लगता है ।

कोई सुखी नहीं इस जग में
काँटे बिखरे हैं सबके मग में
हर चेहरे की खुशी है जाली,
मरघट सा हर घर लगता है ।

अब रिश्तों में वो ताव नहीं
वो पहले जैसे भाव नहीं
अनचीन्हे लगते चेहरे सारे
बदला सब मंजर लगता है ।

कब तक चिथड़े में जीते रहेंगे
कब तक उधड़न सीते रहेंगे
दे दो प्रानों को बसन नया,
ये चोला तो जर्जर लगता है ।

-सीमा अग्रवाल

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