Monday, 25 August 2014

क्यूँ न खिलखिलाएँ आप ---


क्यूँ न खिलखिलाएँ आप ,
आपकी किस्मत बुलंद है ।
अपने यहाँ तो आजकल ,
खुशियों का आना बंद है ।

आपके हर भाव से,
टपकता है रस श्रंगार का ।
अपने तो दिल से निकलता,
गम में डूबा छंद है ।

आपकी दुनिया को रोशन,
करते सूरज चाँद सितारे ।
यहां टिमटिमाता एक दीया है,
जिसकी रोशनी भी मंद है ।

आप जमीं पर क्यों रुकें,
जब पंख मिले हैं चाहतों को ।
अपनी तो हर एक तमन्ना,
दिल में नजरबंद है ।

बेखबर हर गम से उनकी,
बेफिक्र चलती जिंदगानी ।
अपने तो दिल में पनपता,
हर पल नया एक द्वन्द्व है ।

हम से मूरख को मिलें ,
यहाँ कदम कदम पर ठोकरें ।
चालें चल जो चल निकले,
वही बडा हुनरमंद है ।

अनंत है सीमा दुखों की,
गम का कोई अंत नहीं ।
छिनता रहा हमसे वही,
जिसे दिल ने कहा-पसंद है ।

-सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )

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