Tuesday, 29 November 2016

अपना अपना सब खाते हैं .....

अपना- अपना सब खाते हैं !
कुछ सूखा कुछ तर खाते हैं !

नसीब न जिन्हें दो जून की रोटी
आँसू पीते और गम खाते हैं !

हिंसक पशु भी उनसे अच्छे हैं
मासूमों पर जो कहर ढाते हैं !

खुदा की नजर से बच न सकेंगे
जुल्मी यहाँ जो बच जाते हैं !

नेक नीयत होती है जिनकी
वे दिल में गहरे उतर जाते हैं !

कैसे यकीं करे कोई उन पर
करके वादे जो मुकर जाते हैं !

क्या खुशी देंगे वे किसी को
पर खुशी देख जो जल जाते हैं !

देश न उन्हें कभी माफ करेगा
जिनके विदेशों में खाते हैं !

चुप कर 'सीमा' बोल ना ज्यादा
सच को यहाँ सब झुठलाते हैं !

- सीमा

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