Tuesday, 17 February 2015

क्या देने अभी बलिदान रह गए !

जाने कैसी बाढ़ ये आयी
मेरे सब अरमान बह गए !

अपमानों के घूँट मिले औ
रखे सारे सम्मान रह गए !

जग की दलीलें सुनने में,
धरे मेरे फरमान रह गए !

आए इतने अवरोध मग में,
फासले दरम्यान रह गए !

ले उत्कोच मेरी नियति के
सोते सब दरबान रह गए !

जाने कहाँ क्या कमी रही,
मिलने से वरदान रह गए !

लुट गई बस्ती ख्वाबों की
कहाँ मेरे भगवान रह गए !

क्या है मेरे गमों की सीमा
क्या देने बलिदान रह गए !

-सीमा

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