Saturday, 9 April 2016

भरी महफिल से मैं उठ चली

भरी महफिल से मैं उठ चली !
मेरी उपस्थिति सबको खली !

खिलने को थी बेताब मगर
मुरझ गई मेरे दिल की कली !

बदली सी मैं घिर-घिर आई
झर-झर बरसी औ मिट चली !

पूछे कोई नाम पता गर मेरा
कह देना थी पगली मनचली !

सवेरा न कोई नसीब में मेरे
जीवन की मेरे साँझ ढली !

- सीमा

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