Thursday, 11 December 2014

यूँ आशा हमें बहलाती है ---

जब दुख की अति हो जाती है
दिग्भ्रमित मति हो जाती है
एक किरण कौंध कहीं जाती है
यूँ आशा हमें बहलाती है !

जब रात अमा की आती है
राका भी नजर चुराती है
एक लौ कहीं जल जाती है
यूँ आशा हमें बहलाती है !

जब बदली गम की छाती है
घनघोर घटा घिर आती है
चल चपला चमक तब जाती है
यूँ आशा हमें बहलाती है !

अंत निकट जब दिखता है
तम-सा आँखों में घिरता है
अलख ज्योति राह सुझाती है
यूँ आशा हमें बहलाती है !

-सीमा अग्रवाल

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