Tuesday, 17 June 2025

तुम अनूठी सी छटा हो...

सौम्यता शालीनता की,
तुम अनोखी सी छटा हो।
जो निखर उठती बरस कर,
वो घिरी घन की घटा हो।

मुख कमल उत्फुल्ल हर पल,
गम-शिकन दिखती नहीं है।
ये सुघड़ता ये निपुणता,
हर कहीं मिलती नहीं है।
गूढ़ अतिशय पावनी ज्यों,
शंभु की जलमय जटा हो।

घुप तमस में चाँदनी सी।
बादलों में दामिनी सी।
शांति का आभास देती,
रात तुम वो कासनी सी।
केश काले लग रहे ज्यों,
घिर रही काली घटा हो।

मनलुभावन   सादगी तुम।
खुशनुमा इक ताजगी तुम।
क्या  मिसालें  दूँ   तुम्हारी,
जिंदगी  की  बानगी  तुम।
धीरयुत इक वीर ही ज्यों,
कर्म पर अपने डटा हो।

आज जाते देख तुमको,
मूक मन की भावनाएँ,
कर रहीं रुँधते गले से,
बस यही शुभकामनाएँ-
नव सफर ये जिंदगी का,
हर कदम सुख से पटा हो।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

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