Tuesday, 24 November 2020

जगो-उठो हे, कमला कांत.... ( हरि प्रबोधिनी एकादशी पर )

जगो-उठो हे, कमला-कांत ....

पाप शमन हों, ग्रह हों शांत
जगो-उठो हे, कमला-कांत !

आषाढ़  शुक्ल- एकादशी
चले चातुर्मास  शयन  को
दुख-भँवर में घिर गये हम
दर्शन दुर्लभ हुए नयन को
           घात   लगाए   बैठा  तबसे
           काल  बली  सर  पे  दुर्दांत

मेटो दुख हे, कमला-कांत !

रोता हमको  छोड़  गये तुम
भक्तवत्सलता तोड़ गये तुम
गम-आवर्त में देख हमें प्रभु
क्यूँ मुँह हमसे मोड़ गये तुम
          चैन न एक पल पाया तबसे
          है मन  उद्विग्न अति अशांत

लखो पीर  हे, कमला-कांत !

बीते  चार    माह   वे  दुख  के
तिथि सुखद जागृति की आयी
रोम-रोम में  सिहरन खुशी की
बेला  पुन्य  सुकृति  की आयी
     खटते-भटकते आस में सुख की
       प्राण थकित हैं, मन है क्लांत

हरो  ताप  हे,  कमला-कांत !

जाने  कौन  देश से  चल  के
आया  मुआ    दुष्ट   कोरोना
टाले टले न, प्राण हरे कितने
आए  हर पल  हम  को रोना
        बस  उरग-सा गरल उगलता
        आया  लाँघ   सभी  सीमांत

नागांतक   पर  चढ़   आओ
त्रास  मिटाओ  हे,  श्री कांत
        जगो-उठो हे,  कमला कांत !

- © सीमा अग्रवाल
   मुरादाबाद ( उ.प्र. )
"मनके मेरे मन के" से


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