मुक्तक ( छंद मरहटा )
१-
रघुवर घर आए, मन हरषाए, कष्ट हुए सब दूर।
जन-जन में निष्ठा, प्राण-प्रतिष्ठा, जोश अथक भरपूर।।
मंगल धुनि बाजे, अवध विराजे, अग-जग के कर्तार।
शुभ पावन आगम, भक्त समागम, खुशियाँ अपरंपार।।
२-
अग-जग के प्यारे, राजदुलारे, रामलला सुकुमार।
मोहनि अति मूरत, साँवली सूरत, कब से रही निहार।
स्वीकारो वंदन, दशरथ नंदन, दुखिया रही पुकार।
प्रभु दया विचारो, प्राण उबारो, फँसी नाव मझधार।
३-
घर-घर दीवाली, भोर निराली, लायी सुखद बहार।
जन-गण लालायित, मन आप्यायित, प्रभु का रूप निहार।
वन-वन प्रभु भटके, खल-दल पटके, छिड़ा महासंग्राम।
लिए संग सीता, परम पुनीता, लौटे प्रभु निज धाम।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )
फोटो गूगल से साभार
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