Friday, 20 March 2026

रहे सुरक्षित वानिकी...

छाया दी जिस वृक्ष ने,    पोसा देकर अन्न।
आज उसी को काटता, मानव बड़ा कृतघ्न।।

चिड़िया बैठी सोच में, तिनका-तिनका जोड़।
रचूँ नीड़  किस  वृक्ष पर, कब मानव दे तोड़।।

छीन रहे हम स्वार्थ-वश, वन्य-जीव आवास।
पशु-पक्षी बेघर हुए,           झेल रहे संत्रास।।

वन पृथ्वी के फेंफड़े, वन पृथ्वी की श्वास।
वन से जीवन-जोत है, वन जीवन की आस।।

वन दुनिया के फेफड़े, तलछट देते छान।
शुद्ध करें जलवायु को, वन हैं देव समान।।

पीकर कार्बन का जहर,   देते अमृत दान।
तरुवर जीवन के लिए, कुदरत का वरदान।।

नीड़-माँद उजड़े सभी, बिखरे तिनका-पात।
खग-मृग मन-मन कोसते, क्या मानव की जात।।

वृक्षों का रोपण करो, पोषण दो भरपूर।
आएगी वरना प्रलय, दिवस नहीं वह दूर।।

आओ हम सब आज ही, खाएँ ये सौगंध।
जीवन भर निभाएंगे , प्रकृति-पुत्र संबंध।।

पादप सत के रोपिए,  पनपे अंतस - बोध।
अहं भाव को रोकिए, बस इतना अनुरोध।।

मिले फसल मनभावनी,        बिरबे ऐसे रोप।
फल आशा-अनुरूप हो, झलके आनन ओप।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)

फोटो गूगल से साभार

No comments:

Post a Comment