Thursday, 2 March 2017

रे मन पगले, मान ले बात ---

लुटाता रहा तू सब पर प्यार
कभी तो अपनी ओर निहार

स्वार्थ ग्रसित है जग ये सारा
सिर्फ अपने मतलब का यार

जगती हँसती सुख में अपने
तू क्यों ढोए अश्कों का भार

तू ही नहीं जब अपना होगा
कौन करेगा तुझपर उपकार

गिरती दिन- दिन सेहत तेरी
पड़ेगा एक दिन लंबा बीमार

रे मन पगले, मान ले अब तू
ना कर यूँ खुद पर अत्याचार

घटता जाए तिल-तिल जीवन
किस पल का है तुझे इंतजार

जब अपने पर आकर पड़ती
रोता है मनुज तब नौ-नौ धार

अपनी खुशी में खुश रह तू भी
जी मस्ती में दिन बचे जो चार

उस असीम का अंश है तू भी
सीमा पर अपनी कर न विचार

कोई न खेवट जीवन- नैया का
सँभाल तू खुद अपनी पतवार

- सीमा
०२-०३-२०१७

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