Thursday, 8 December 2016

तुम आराध्य मैं एक पुजारिन.....

तुम आराध्य, मैं एक पुजारिन
तुम सौभाग्य, मैं एक अभागिन
तुम बिन अब मेरा ठौर कहाँ
तुम सा जग में कोई और कहाँ
दर तक तुम्हारे आ न सकी तो
एक झलक तुम्हारी पा न सकी तो
तड़पूँगी जनम- जनम

आस मिलन की छूटी जिस दिन
अलविदा कह जग को उस दिन
फिर- फिर जन्मूँगी, तुम्हें खोजूँगी
बीज नेह के मन में रोपूँगी
फिर भी तुमको पा न सकी तो
करीब तुम्हारे आ न सकी तो
भटकूँगी जनम- जनम

रहे सनातन अब ये जोड़ी
तुम रहो चंदा मैं बनूँ चकोरी
रोशन करोगे जब तुम जग सारा
मेरे मन का भी धुलेगा अंधियारा
मधुर स्मित की बलवती आस लिए
नजरों में अनबुझी इक प्यास लिए
निहारूँगी जनम- जनम

चाहे दुनिया कितनी बात बनाए
चाहे मुझ पर सौ इल्जाम लगाए
चाहे तुम मुँह मोड़ लो मुझसे
चाहे हर नाता तोड़ लो मुझसे
चाहा है तुम्हें तो चाहती रहूंगी
चाहे मुँह से कुछ ना कहूँगी
इस धरती पर मैं रीत नेह की
निभाऊँगी जनम- जनम

सावन- सी घिर- घिर आऊंगी
बदली- सी बरसकर मिट जाऊंगी
जलकण खींच मन- वारिधि से
नेह- घट अंखियों से छलकाऊंगी
ढूँढोगे मेरा पता तुम जब तक
ले लूँगी विदा मैं जग से तब तक
यूँ आँख- मिचौनी मैं संग तुम्हारे
खेलूँगी जनम- जनम

- सीमा

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