मानवता को लीलते, दंगा-युद्ध-फसाद।
हाथ मिले तो क्या मिले, बरबादी के बाद।।
युद्ध शांति का हल नहीं, करो स्वस्थ संवाद।
मिल आपस में बात हो, मेटे सकल विवाद।।
अंत नहीं संघर्ष का, घोषित युद्ध विराम।
बदले की रणनीतियाँ, कल क्या दें पैगाम।।
युद्ध-फसाद-तनातनी, वैश्विक मेधा-ह्रास।
बने आपसी रार से, धरा राहु का ग्रास।।
देख दृश्य वीभत्स ये, सुन चौतरफा शोर।
लिखी भाग्य में दिख रही, वैश्विक विपदा घोर।।
युद्ध मानसिक खौफ है, युद्ध नरक का द्वार।
जितनी इसमें जीत है, उससे ज्यादा हार।।
सुख-साधन के बीच भी, साले एक अभाव।
अवशेषों में देखिए, घातक युद्ध प्रभाव।।
बात न बनती युद्ध से, होता बस संहार।
त्राहित्राहि जनता करे, हर सूं हाहाकार।।
दुनिया एक कुटुंब है, रहें सभी मिल साथ।
स्वार्थ पूर्ण इस जंग से, क्या आएगा हाथ ?।।
स्वार्थ अहम् में चूर जन, रचते नित्य बबाल।
अहं युद्ध की घोषणा, क्षमा शांति की ढाल।।
युद्ध न केवल जानिए, तलवारों का खेल।
करे शांति का अपहरण, बोए बिष की बेल।।
जीवन सुंदरतम बने, वरो शांति की राह।
बढ़ते युद्ध-प्रमाद से, लालच-नफरत-डाह।।
डॉ. सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )
"किंजल्किनी-2" से
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