Sunday, 16 July 2017

सबकी 'सीमा' खैर मना...

इधर-उधर मत ताका कर
मन के भीतर झाँका कर

काँटों भरी राह पर भी तू
फूल खुशी के टाँका कर

मोती भी चुग लाया कर
यूँ ही धूल न फाँका कर

किया कर कुछ काम की बातें
खाली गप्प ना हाँका कर

सबकी अपनी कीमत है
कम न किसी को आँका कर

हुनर उजागर कर सबके, पर
दोष न अपने ढाँका कर

सबकी 'सीमा' खैर मना
बाल न किसी का बाँका कर

- सीमा
26-04-2013

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