Saturday, 28 March 2026

रघुवर घर आए...

मुक्तक  ( छंद मरहटा )


१-
रघुवर घर आए, मन हरषाए, कष्ट हुए सब दूर।
जन-जन में निष्ठा, प्राण-प्रतिष्ठा, जोश अथक भरपूर।।
मंगल धुनि बाजे, अवध विराजे, अग-जग के कर्तार।
शुभ पावन आगम, भक्त समागम, खुशियाँ अपरंपार।।

२-
अग-जग के प्यारे, राजदुलारे, रामलला सुकुमार।
मोहनि अति मूरत, साँवली सूरत, कब से रही निहार।
स्वीकारो वंदन, दशरथ नंदन, दुखिया रही पुकार।
प्रभु दया विचारो, प्राण उबारो, फँसी नाव मझधार।

३-
घर-घर दीवाली, भोर निराली, लायी सुखद बहार।
जन-गण लालायित, मन आप्यायित, प्रभु का रूप निहार।
वन-वन प्रभु भटके, खल-दल पटके, छिड़ा महासंग्राम।
लिए संग सीता, परम पुनीता, लौटे प्रभु निज धाम।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

फोटो गूगल से साभार

Thursday, 26 March 2026

चैत्र मास की तिथि नवम्...

चैत्र मास की तिथि नवम्, लिया राम अवतार।
कौशल्या की कोख से,    उपजा जग-कर्त्तार।।

काँधे पर कोदंड है,   अभिमंत्रित हर वाण।
शोषक का संहार कर, दें शोषित को त्राण।।

राम एक गतिशीलता, राम एक हैं पंथ।
राम चरित यों जानिए, जैसे पावन ग्रंथ।।

लीला अद्भुत आपकी, अद्भुत है लालित्य।
वर्णित जिसमें आप हैं, अद्भुत वह साहित्य।।

रोम-रोम में रम रहे,       रमण करें श्रीराम।
मन मानस मेरा बने, सुखद अयोध्या धाम।।

खिले सरोरुह से नयन, कोमल कुसुमित प्रान।
चरण-कमल से आपके,  मन   पावन-उद्यान।।

डोर तुम्हारे हाथ प्रभु, आर करो या पार।
जगत हमारा पालना, तुम हो पालनहार।।

किए बिना वन में गमन, राम न होते राम।
संघर्षों में जीत है,        हारें नित आराम।।

त्याग समर्पण साधना, कर्मनिरत निष्काम।
वनवासी होकर हुए,    मन-मन वासी राम।।

रहता जल में ज्यों कमल, रहे जगत में राम।
माया से निर्लिप्त थे,     मायापति सुखधाम।।

राजकुँवर रघुवंश के,    वश में जिनके पौन।
विरक्त समाधि लीन वह, योगी उनसा कौन ?

करो समर्पण राम सा,  सीता सा संघर्ष।
जो तुम चाहो देखना, प्रेम - नेम उत्कर्ष।।

अद्भुत संयम शील है,    नहीं आप सा अन्य।
चरण-आचरण आपके, करें जगत को धन्य।।

राम सरिस हो आचरण, राम सरिस हो त्याग।
मिटें तामसी वृत्तियाँ,      जागें जग के भाग।।

राम नाम का ध्यान ही,   करता बेड़ा पार।
बंधन जिसके हम बँधे, वही मुक्ति आधार।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )


Friday, 20 March 2026

रहे सुरक्षित वानिकी...

छाया दी जिस वृक्ष ने,    पोसा देकर अन्न।
आज उसी को काटता, मानव बड़ा कृतघ्न।।

चिड़िया बैठी सोच में, तिनका-तिनका जोड़।
रचूँ नीड़  किस  वृक्ष पर, कब मानव दे तोड़।।

छीन रहे हम स्वार्थ-वश, वन्य-जीव आवास।
पशु-पक्षी बेघर हुए,           झेल रहे संत्रास।।

वन पृथ्वी के फेंफड़े, वन पृथ्वी की श्वास।
वन से जीवन-जोत है, वन जीवन की आस।।

वन दुनिया के फेफड़े, तलछट देते छान।
शुद्ध करें जलवायु को, वन हैं देव समान।।

पीकर कार्बन का जहर,   देते अमृत दान।
तरुवर जीवन के लिए, कुदरत का वरदान।।

नीड़-माँद उजड़े सभी, बिखरे तिनका-पात।
खग-मृग मन-मन कोसते, क्या मानव की जात।।

वृक्षों का रोपण करो, पोषण दो भरपूर।
आएगी वरना प्रलय, दिवस नहीं वह दूर।।

आओ हम सब आज ही, खाएँ ये सौगंध।
जीवन भर निभाएंगे , प्रकृति-पुत्र संबंध।।

पादप सत के रोपिए,  पनपे अंतस - बोध।
अहं भाव को रोकिए, बस इतना अनुरोध।।

मिले फसल मनभावनी,        बिरबे ऐसे रोप।
फल आशा-अनुरूप हो, झलके आनन ओप।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)

फोटो गूगल से साभार

Thursday, 19 March 2026

तप निरत ब्रह्मचारिणी...

कठोर व्रती तपस्विनी, ब्रह्मचारिणी मात।
भक्ति-मगन शिवलीन हो, भूलीं सुधबुध गात।।

लिए कमंडल वाम में, दाँए में जप-माल।
तप निरत ब्रह्मचारिणी, दमके तेजस भाल।।

शिव-आराधन लीन हो,     त्यागे सारे भोग।
बिल्व पत्र के बल किए, सिद्ध साधना योग।।

निराहार निर्जल शिवा, शिवमय सुबहो-शाम।
त्याग पर्ण तन धारतीं,      पड़ा अपर्णा नाम।।

लिए शंभु की चाह में, जन्म एक सौ आठ।
जपें शिवा शिव नाम बस, भूलीं सारे ठाठ।।

चाह घनी मन में बसी, पाना है निज प्रेय।
भूलीं सारे भोग माँ,  याद रहा बस ध्येय।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )

Wednesday, 18 March 2026

कष्ट हरो माँ शैलजे...

शिव-आराधन लीन हो,     त्यागे सारे भोग।
बिल्व पत्र के बल किए, सिद्ध साधना योग।।

निराहार निर्जल शिवा, शिवमय सुबहो-शाम।
त्याग पर्ण तन धारतीं,      पड़ा अपर्णा नाम।।

लिए शंभु की चाह में, जन्म एक सौ आठ।
जपें शिवा शिव नाम बस, भूलीं सारे ठाठ।।

चाह घनी मन में बसी, पाना है निज प्रेय।
भूलीं सारे भोग माँ,  याद रहा बस ध्येय।।

सुख-दुख में समभाव हो, रहे बीच बन सेतु।
साधन शक्ति सुमंगला,  बने विजय का हेतु।।

वाम हस्त सोहे कमल, दाएँ हस्त त्रिशूल।
शैलसुता बृषवाहिनी, हरतीं जग के शूल।।

अर्द्ध चंद्र मस्तक फबे, कर सोहे त्रिशूल।
ताप हरो  माँ शैलजे, हर  लो सारे  शूल।।


अद्भुत माँ की शक्तियाँ...

नवग्रह एकाकार हो, करते जब मन क्लांत।
माता की नव शक्तियाँ,  करतीं उनको शांत।।१।।

अद्भुत माँ की शक्तियाँ, अद्भुत माँ का रूप।
दर्शन देतीं भक्त को,        धारे रूप अनूप।।२।।

नवरातों में पूज लो,       मैया के नवरूप।
मोहक छवि मन में बसा, हो जाओ तद्रूप।।३।।

कलुष वृत्ति मन की हरें, माता के नव रूप।
भक्ति-शक्ति के जानिए,   मूर्तिमंत स्वरूप।।४।।

पूजो माता के चरन,   ध्या लो उन्नत भाल।
वरद हस्त माँ का उठे, हर ले दुख तत्काल।।५।।

रिपुओं से रक्षा करे,    बने भक्त की ढाल।
बरसे जब माँ की कृपा, कर दे मालामाल।।६।।

मधुर-भाव चुन चाव से, सजा रही दरबार।
मेरे घर भी अंबिके,  आना  अबकी  बार।।७।।

माता के दरबार में, कोई ऊँच न नीच।
समरसता बरसे यहाँ, भर-भर नेह उलीच।।८।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )

Tuesday, 17 March 2026

आयी मीठी ईद...

कुरान गीता बाइबिल, सार सभी का एक।
धर्म चुनो कोई मगर,  कर्म करो बस नेक।।

पथ सच्चाई का वरो, करो न खोटे कर्म।
जात-पाँत सब व्यर्थ है, मानवता ही धर्म।।

ग्रंथ पवित्र कुरआन है, रहमत की बरसात।
सूरा पहला फ़ातिहा,  आयत जिसमें सात।।

पढ़ें सभी अल फ़ातिहा, सूरा प्रथम कुरान।
दया रहम अल्लाह करे,  बंदा अपना जान।।

हर बरकत दे आपको, पाक माह रमजान।
पथ पर नेकी के चलो, कहती है कुरआन।।

रोजे रख कर पढ़ें यदि, पाँचों वक्त नमाज।
अमन-चैन कायम रहे,   संयत रहे समाज।।

मदद मुस्तहिक़ की करें, आएँ उनके काम।
तन-मन-धन से साथ दें, करें न केवल नाम।।

जब्ते नफ़्स की तरबियत, देती है कुरआन।
पाकीज़ा मन को करे,  पाक माह रमजान।।

सब रातों में श्रेष्ठ है, रात लैलतुल कद्र।
जैसे कोई मौलवी,       जैसे कोई सद्र।।

रोज़ों का अंतिम चरण, हरि राया की धूम।
शॉपिंग करतीं नारियाँ,  गली-गली में घूम।।

हर्ष मगन मन नाचता, हुआ चाँद का दीद।
कितने रोज़ों बाद अब,    आयी मीठी ईद।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Sunday, 15 March 2026

फूलदेई छम्मादेई...

मास चैत्र का आगमन,   स्वागत है नववर्ष।
हर देहरी फूले फले, दिशि-दिशि बरसे हर्ष।।

सजा फूलकंडी सुघर, थाम हाथ में हाथ।
डोली में लेकर चले,    घोघा माता साथ।।

बच्चे चुन-चुन ला रहे, फ्योंली और बुरांस।
घोघा माँ स्वीकारिए,     पूरी कीजे आस।।

खेतों में सरसों खिली, खिले वृक्ष पर फूल।
खिली-खिली भू-सुंदरी, ओढ़े खड़ी दुकूल।।

घर-घर मंगल-हर्ष हो, चुभे न कोई शूल।
करते सुख की कामना, चढ़ा देहरी फूल।।

लिए फूलकंडी चले, घर-घर देहरी द्वार।
बच्चों की शुभकामना, करना माँ स्वीकार।।

रहे देहरी आपकी,        फूलों से भरपूर।
रहें सदा खुशहाल सब, बना रहे जग नूर।।

मन हरते सौंदर्य से, मेटें मन के शूल।
धरती का श्रंगार हैं, ये अलबेले फूल।।

घर-घर गाते बाजगी, बजा दमाऊ ढोल।
आँगन-आँगन गूँजते, मधुर सुरीले बोल।।

ढोल दमाऊ ले चले, औली घर-घर द्वार।
मंगलमय हो आपको, फूलों का त्यौहार।।

साइत स्वाला पक रहे, उठती सोंधी गंध। 
हलवा छोई पापड़ी,         देते परमानंद।।

मना रहे हिलमिल सभी, नवल पुष्प का पर्व।
अपनी संस्कृति पर सदा, करें सभी जन गर्व।।

सामाजिक सद्भाव के,  सूचक सुंदर पर्व।
अपने भारत को सदा, निज संस्कृति पर गर्व।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

फोटोज गूगल से साभार

Tuesday, 3 March 2026

उड़ें प्यार के रंग...

नस-नस में रस पूरता, आया फागुन मास।
रिसते रिश्तों में चलो,  भर दें नयी उजास।।

भर मस्ती में झूमते, मन में लिए उमंग।
हुरियारे - हुरियारिनें,    रँगे प्रेम के रंग।।

श्री राधे की लाठियाँ, श्री कान्हा की ढाल।
बरसाने की छोरियाँ, नंदगांव के लाल।।

फगुनाहट ये फाग की, देख गगन भी दंग।
इन्द्र धनुष से होड़ कर,    उड़ते सातों रंग।।

टेसू हुलसित रागमय, खड़ा सुसज्जित द्वार।
ले फूलों की टोकरी,         स्वागत में तैयार।।

प्राची के आँगन छपी,   रंग-बिरंगी कीच।
सकुचाई भीगी धरा, नयन लाज से मीच।।

बनी धरा अभिसारिका, साजे नव श्रंगार।
सतरंगी पिचकारियाँ,    घेर खड़ीं तैयार।।

धरा अभिसार उत्सवा, रंग चितेरा सूर्य।
रंगों की वर्षा करे,     लिये हाथ में तूर्य।।

नफरत की होली जले, उड़ें प्यार के रंग।
आनंदमय त्यौहार हो, रहें सभी मिल संग।।

होली की शुभकामना, करें सभी स्वीकार।
मनचाही खुशियाँ मिलें, सुखी रहे परिवार।।

वैमनस्य का त्याग कर, रहें सभी मिल संग।
सीखें हम भी आज से,   मौमाखी के  ढंग।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद

Saturday, 14 February 2026

उन शहीदों को नमन...

पुलवामा में शहीद हुए हमारे वीर सैनिकों की स्मृति में ...

देश-हित जो    मर मिटे उन शहीदों को नमन।
छल से जिनके सर कटे उन शहीदों को नमन।

खाते रहे आतंकी की जो गोलियों पे गोलियाँ।
 सीना ताने रहे डटे   उन शहीदों को नमन।

रह सकें महफूज हम सब घर में अपने चैन से।
कर्तव्य-पथ से जो न हटे उन शहीदों को नमन।

जयहिंद-जयहिंद नींद में भी बड़बड़ाते जो सदा।
बदलते रहे नित करवटें  उन शहीदों को नमन।

शहादत उनकी याद कर नमनाक हैं अब भी नयन।
चले गए  तिरंगे में लिपटे उन शहीदों को नमन।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उत्तर प्रदेश )
14 फरवरी

Friday, 13 February 2026

वैलेंटाइन वीक....

वैलेंटाइन वीक...

हम भी चले मनाने अबके
वैलेंटाइन वीक।
डूब रहे थे प्रेम-भँवर में
तोड़ पुरानी लीक।

पहला दिन था चुन बगिया से
लाए एक गुलाब।
घुटनों के बल बैठ प्रिय को
देकर कहा जनाब-
तुम भी करो प्रपोज हमें अब
देकर प्रेम-प्रतीक।

एक हाथ में हाथ हमारा
एक हाथ में रोज़।
बड़े प्रेम से निरख नयन में
प्रिय ने किया प्रपोज।
लव यू लव यू कहकर बीता
दूजा दिवस सटीक।

दिवस तीसरा प्रेम पगा था
लाया नया खुमार।
रंग-बिरंगी चॉकलेट का
मिला हमें उपहार।
रखा कौर इक ज्यों ही मुँह में
आई हमको छींक।

टैडी लेकर आए प्रियतम
चौथे दिन की रात।
रखकर उसे हाथ में बोले
स्वीकारो सौगात।
कहो बात कुछ अपने मन की
बैठो निकट घरीक।

प्रॉमिस डे पर बोले प्रियवर
प्रण लेता हूँ आज।
साथ निभाऊँ सदा तुम्हारा
पूर्ण करूँ हर काज।
प्रण पर अपने अडिग रहूँगा
समझो नहीं अलीक।

हग डे पर हम और पिया जी
हो आलिंगन  बद्ध।
साथ-साथ जीने-मरने को
थे दिल से प्रतिबद्ध।
डाल कमर में बाँह प्रिय ने
खींच लिया नजदीक।

आया किस डे खड़े निकट प्रिय
सटा चीक से चीक।
नत आनन हम लाज भरे, पर
डटे रहे निर्भीक।
अधर अधर रख बोले प्रियतम
करो प्रेम तस्दीक।

उत्सव का माहौल बना था
दृश्य सुखद रमणीक।
देने आशीर्वाद हमें जब
अपने हुए शरीक।
सराबोर कर गयी हृदय को
अद्भुत ये तकनीक।

सात दिवस ये सात जनम से
देते ये संदेश।
बनी रहे मृदुता रिश्तों में
मधुमय हो परिवेश।
गोते खाकर प्रेमोदधि में
भूले गम-तारीक।

खुशी-खुशी यूँ मना हमारा,
वैलेंटाइन वीक।

© डॉ. सीमा अग्रवाल
 मुरादाबाद ( उ.प्र. )
"गीत सौंधे जिंदगी के" से

Tuesday, 20 January 2026

बात है ये उन दिनों की...

बात है ये उन दिनों की...

उन दिनों की बात में रस।
उन दिनों की रात में रस।
उन दिनों मौसम हसीं था,
उन दिनों बरसात में रस।

उन दिनों बातें निराली।
उन दिनों रातें उजाली।
उन दिनों सब कुछ सुखद था,
उन दिनों हर ओर लाली।

उन दिनों हर दिन रँगीला।
उन दिनों सावन सजीला।
साँझ पलकों पर उतरती,
आँजती अंजन लजीला।

उन दिनों हँसना सरल था।
भावभीना   मन तरल था।
बोल अमृत से सने थे,
उन दिनों कब ये गरल था।

उन दिनों को याद करते,
आँख से आँसू बरसते।
उन दिनों की बात क्या,अब
बात करने को तरसते।

अब भरे हों माल कितने,
पर कहाँ दिल में जगह है।
बेवजह बस हँस रहे हैं,
अब कहाँ सुख की वजह है।

अब सभी सुख साज घर में
पर कहाँ सुख उन दिनों सा।
हर   तरफ   वीरानगी   है,
घुप  तमस  है  दुर्दिनों  सा।

आज भी ठहरे वहीं हम,
उन दिनों को जी रहे हैं।
रिस रहा हर पोर से जो,
अर्क  नेहिल  पी  रहे हैं।

हूक सी मन में उठी है,
उन दिनों को छीन लाएँ।
टूटकर छिटकी कहीं जो,
हर कड़ी वो बीन लाएँ।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Thursday, 15 January 2026

सर्द महीना माघ...

पौष मास को कर विदा, आया देखो माघ।
बैठा जम कर जिन्न सा, लगता कैसा  घाघ।।

बर्फ पहाड़ों पर गिरी,         ठिठुर रहे मैदान।
पाला खुशियों पर पड़ा, सिकुड़ रहे अरमान।।

कुहरा छाया दूर तक,   दिखा रहा है ताव।
माघी शीतल चाँदनी, करती उर पर घाव।।

सर्दी देखो माघ की, जमी पड़ीं सब झील।
कुहरे ने तांडव रचा,  खुशियाँ सारी लील।।

माघ मास पाला पड़ा, बढ़ता अनुदिन शैत्य।
धरा अनवरत खोजती, छुपे कहाँ आदित्य ?।।

सोकर बीतें शीत में,  सुबह-दुपहरी-शाम।
हाथ-पाँव चलते नहीं, कैसे सिमटें काम।।

लुढ़का पारा शून्य पर, कुहर-शीत की धूम।
सूरज भी आया मनो,  सर्द हिमालय चूम।।

पाला पड़ा दिमाग पर, हाथ-पाँव सब सुन्न।
बिस्तर में दुबके हुए,       सभी पड़े हैं टुन्न।।

माघ मास की शीत है,     चलीं हवाएँ सर्द।
ठिठुर-ठिठुर कर हो रहा, चंद्रानन भी जर्द।।

शीत यामिनी माघ की,  गिरा रही थी गाज।
हिमखंडों को चीरता, निकला सूरज आज।।

बरस रही है व्योम से, नाजुक नरम निदाघ।
कुछ दिन के आतिथ्य पर, सर्द महीना माघ।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र. )

Sunday, 11 January 2026

सर्द महीना माघ...

पौष मास को कर विदा, आया देखो माघ।
बैठा जम कर जिन्न सा, लगता कैसा  घाघ।।

कुहरा छाया दूर तक,  दिखा रहा है ताव।
माघी शीतल चाँदनी, करती उर पर घाव।।

सर्दी देखो माघ की, जमी पड़ीं सब झील।
कुहरे ने तांडव रचा,  खुशियाँ सारी लील।।

माघ मास पाला पड़ा, बढ़ता अनुदिन शैत्य।
धरा अनवरत खोजती, छुपे कहाँ आदित्य ?।।

सोकर बीतें शीत में,  सुबह-दुपहरी-शाम।
हाथ-पाँव चलते नहीं, कैसे सिमटें काम।।

लुढ़का पारा शून्य पर, कुहर-शीत की धूम।
सूरज भी आया मनो,  सर्द हिमालय चूम।।

पाला पड़ा दिमाग पर, हाथ-पाँव सब सुन्न।
बिस्तर में दुबके हुए,       सभी पड़े हैं टुन्न।।

माघ मास की शीत है,    चलीं हवाएँ सर्द।
ठिठुर-ठिठुर कर हो रहा, चंद्रानन भी जर्द।।

शीत यामिनी माघ की,  गिरा रही थी गाज।
हिमखंडों को चीरता, निकला सूरज आज।।

बरस रही है व्योम से, नाजुक नरम निदाघ।
कुछ दिन के आतिथ्य पर, सर्द महीना माघ।।

© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)