पौष मास को कर विदा, आया देखो माघ।
बैठा जम कर जिन्न सा, लगता कैसा घाघ।।
कुहरा छाया दूर तक, दिखा रहा है ताव।
माघी शीतल चाँदनी, करती उर पर घाव।।
सर्दी देखो माघ की, जमी पड़ीं सब झील।
कुहरे ने तांडव रचा, खुशियाँ सारी लील।।
माघ मास पाला पड़ा, बढ़ता अनुदिन शैत्य।
धरा अनवरत खोजती, छुपे कहाँ आदित्य ?।।
सोकर बीतें शीत में, सुबह-दुपहरी-शाम।
हाथ-पाँव चलते नहीं, कैसे सिमटें काम।।
लुढ़का पारा शून्य पर, कुहर-शीत की धूम।
सूरज भी आया मनो, सर्द हिमालय चूम।।
पाला पड़ा दिमाग पर, हाथ-पाँव सब सुन्न।
बिस्तर में दुबके हुए, सभी पड़े हैं टुन्न।।
माघ मास की शीत है, चलीं हवाएँ सर्द।
ठिठुर-ठिठुर कर हो रहा, चंद्रानन भी जर्द।।
शीत यामिनी माघ की, गिरा रही थी गाज।
हिमखंडों को चीरता, निकला सूरज आज।।
बरस रही है व्योम से, नाजुक नरम निदाघ।
कुछ दिन के आतिथ्य पर, सर्द महीना माघ।।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)